पिता की मेहनत ने बेटे को ‘स्लो लरनर’ से बनाया ‘वंडर किड’
ननु जोगिंदर सिंह, चंडीगढ़ nj.singh@dbcorp.in
डिलीवरीडेट से पहले पैदा होने वाले एक बच्चे को डॉक्टरों ने स्लो लरनर कहा था। पिता की मेहनत और जिद ने इस बच्चे को आज ‘वंडर किड’ बना दिया। यह कहनी है पंचकूला के गुरुकुल पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले यशस्वी बलारा और उनके पिता डॉ. देव बलारा की। ‘वंडर किड’ के नाम से मशहूर यशस्वी ने छोटी उम्र में मैथेमेटिक्स कैलकुलेशन कंपीटिशन में गोल्ड मेडल और पांच साल की उम्र में टेनिस में गोल्ड मेडल जीता है। वह अब तो वह 10 वीं तक का मैथ्स और साइंस पढ़ चुका है। इन दिनों वह ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री पढ़ रहा है और दो किताबें लिख रहा है।
अप्रैल 2011 में हुए मैथेमैटिक्स कैलकुलेशन कंपीटिशन में 3 मिनट में 70 सवालों के जवाब देने थे। इस कंपीटिशन में यशस्वी बलारा ने गोल्ड मेडल जीता था। इसके अलावा टेनिस में भी यशस्वी ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया है।
यशस्वी बलारा का जन्म 2007 में हुआ था। डॉ. देव ने बताया कि दो साल की उम्र में पहली बार उनका बेटा बोला। उसके बोलने के साथ ही उसकी मेंटल ट्रेनिंग शुरू कर दी। वह स्कूल जाने लगा तो वह रोजाना ‘हाफ डे’ लेकर जाते। बच्चा टेनिस खेलते हुए खुश रहता था। उन्होंने ट्रांसफर कराने की कोशिश की क्योंकि करनाल में टेनिस कोचिंग के अच्छे इंतजाम नहीं थे। 5 साल की उम्र में यशस्वी ने गोल्ड जीता तो एक कोच ने डॉ देव से कहा था कि मुझे अपना बच्चा सौंप दें। वह थकता नहीं है। कोच का मानना था कि वह बेहतरीन प्लेयर बन सकता है। यदि एक कोच उसके लिए अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा दे सकते हैं तो वह क्यों नहीं। यही सोच कर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद कोचिंग में जुट गए।
अपने बेटे को एक ‘स्लो लरनर’ से ‘वंडर किड’ बनाने के सफर को साझा किया डॉ. देव ने दैनिक भास्कर के साथ।
देव बताते हैं कि टाइम से पहले पैदा हुए बच्चे के लिए डॉक्टरों का कहना था कि वह स्लो लरनर होगा। लाखों में कोई बच्चा ही होता है जो टाइम से पहले पैदा होने के बाद भी सरवाइव करता है इसलिए ज्यादा उम्मीदें ना करें। लेकिन अपने टीचिंग अनुभव और साइकोलॉजी में दिलचस्पी के कारण वह जानते था कि उनका बच्चा खास है। बच्चे में छह तरह की इंटेलिजेंस होती है, इनमें से किसी एक में तो वह एक्सेल करेगा ही। इसी को तलाशने के लिए उसके साथ रहने का डिसिजन किया।