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लोग समझदार, सेंसर बोर्ड की जरूरत नहीं : प्रकाश झा

5 वर्ष पहले
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चंडीगढ़। ‘असल में सेंसर बोर्ड की जरूरत ही क्यों है। चंद लोग यह कैसे तय कर सकते हैं कि देश की लोगों को क्या देखना चाहिए आैर क्या नहीं। सेंसर बोर्ड का इस तरह चीजों को फिल्टर करना गलत है। इसके लिए सोसायटी के लोग है न, वे खुद तय करेंगे।

उन्हें अच्छे बुरे की समझ है। वे सब कुछ खुद तय कर सकते हैं।’ यह कहना है बॉलीवुड डायरेक्टर-प्रोड्यूसर प्रकाश झा का। वे इन दिनों वे प्राइड एंड खाकी कैंपेन के तहत देशभर की महिला पुलिस कर्मचारियों को जागरूक करने में लगे हुए हैं। इसी के चलते वे चंडीगढ़ पहुंचे थे। उनसे हमारी मुलाकात हुई।

कहने लगे, देखिए यह कोई नहीं तय कर सकता कि आप क्या खाओगे, पिअोगे या फिर कैसे रहोगे। अगर किसी को कुछ देखना है तो वो देखेगा ही। उसे कैसे कोई रोक सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर पाेर्न फिल्में बनाई जानी लगें और वे सिनेमा में लगने लगें, फिर क्या उन्हें आप देखने नहीं जाएंगे। यकीनन लाेग उन्हें जरूर देखने जाएंगे। हां कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो नहीं देखने जाएंगे। जब फिल्में बनाई जाती हैं तो उनका मकसद सिर्फ एंटरटेनमेंट होता है।
यह लोगों के लिए बनाई जाती हैं। कई बार इन पर सेंसर बोर्ड की कैंची तर्कहीन तरीके से चल जाती है। यह बिल्कुल भी सही नहीं है। फिल्म से अगर किसी चीज को काट दिया जाता है तो ऐसा नहीं है कि उसका पता नहीं चलता वो चीजें कहीं न कहीं से सामने आ ही जाती हैं। जैसा आजकल यू-ट्यूब व सोशल मीडिया पर देखने को मिलता है। इसलिए फिल्मों में चीजों की इस तरह फिल्टरिंग की जरूरत नहीं है। ऐसा करने से उन चीजों को आैर बढ़ावा मिलता है। हर चीज को खुलकर सामने आने देने की जरूरत है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड की जरूरत है।

काम के सिलसिले में मैं हर बार एक नई टेरेटरी को एक्सप्लोर करता हूं। यह मेरे लिए बहुत चैलेंज लेकर आती है। अपनी फिल्म से जिस चीज को लाता हूं तो उसके लिए नए लोगों को क्रिएट करना पड़ता है आैर यह बहुत खोजबीन वाला कार्य होता है। इसे मैं काफी इंट्रस्टिंग तरीके से देखता हूं। फिल्म मेकिंग के इसी प्रोसेस को काफी अच्छे से एंजॉय करता हूं। इसके लिए काफी रिसर्च भी करता हूं।
राजनीति का शौक अब खत्म
फिर से राजनीति में उतरने का कोई इरादा? प्रकाश झा कहते हैं, जितनी नेतागिरी करनी थी वो हो गई है। 2009 में मेरा यह शौक खत्म हो गया। अब लोकसभा चुनाव या पार्टी के साथ जुड़ने की कोई चाह नहीं बची। बस, अपना काम करने में लगा हूं। इस कोशिश में लोगों के सामने सोसायटी की तस्वीर आए। वो सबकुछ अपने आप समझ पाएं। सिनेमा का सोसायटी को बनाने व बिगाड़ने में महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसलिए सिनेमा से जुड़े लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी भूमिका को अब समझ रहा हूं। इसे पहले भी समझता था और अब भी।
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