104 अवाॅर्ड जीत चुके फिल्मकार की कहानी, 25 नेशनल और इंटरनेशनल अवाॅर्ड शामिल

5 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. छह मिनट से लेकर दो घंटे की अवधि वाली 41 फिल्में। इन फिल्मों के लिए 104 अवाॅर्ड। ये हैं हैदराबाद के युवा फिल्मकार अंशुल सिन्हा। फिल्मों की दीवानगी ऐसी कि मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दी। प्रोडक्शन हाउस में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया, लेकिन जब इन्हें अपनी फिल्मों के लिए प्रोडक्शन हाउस से कोई मदद नहीं मिली तो वह जॉब भी छोड़ दी। 
 
अंशुल सीरियस फिल्में बनाते हैं। समस्याओं से जुड़ी। पैसा जुटाना सबसे बड़ा संकट रहता है। हाल ही में अंशुल ने "मिट्‌टी : बैक टू रूट्स' फिल्म बनाई है। किसानों पर आधारित। इसके लिए पहले अपने हाथों से फिल्म के एक हजार स्कैच बनाए। चार महीने तक रिसर्च की। लेकिन जिस प्रोडक्शन हाउस में जाते, वहीं से उल्टा लौटा दिए जाते।
 
साढ़े तीन लाख रुपए जुटाए
 
एक लाख रुपए खुद के पास थे। साढ़े चार लाख रुपए में फिल्म तैयार कर डाली। सब्जेक्ट चूंकि गंभीर था, किसानों की समस्या को उठाने वाला था, ऐसे में कास्ट ने भी इनकी मदद की। 55 लोगों की कास्ट सिर्फ सवा लाख रुपए में काम करने को तैयार हो गई। अंशुल कॉलेज के दिनों से ही फिल्में बना रहे हैं। एक फिल्म को मिले पुरस्कार की रकम से ही उनकी अगली फिल्म का बजट तय होता था। अंशुल की फिल्म अमेरिका, इटली सहित कई देशों में फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा चुकी हैं। 
 
“मिट्‌टी : बैक टू रूट्स’ के बारे में अंशुल कहते हैं- मैंने सोचा नहीं था कि किसानों की समस्या पर फिल्म बनाना इतना मुश्किल होगा। अंशुल फिल्म के लिए हैदराबाद के गांवों में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों से जाकर मिले। भाषा आड़े गई। किसान अंग्रेजी नहीं समझते थे और अंशुल तेलुगू। ऐसे में स्थानीय गिरी बाबू और कोंडल रेड्डी सहारा बने। अंशुल ने फिल्म में वास्तविकता दिखाने के लिए खुद खेती सीखी। देश के पहले ऑर्गेनिक गांव-एनाबावी में शूटिंग करते हुए अपने हाथों से कीटों कोे पकड़ना सीखा। रात-रातभर खेतों में रहे। वाटर हार्वेस्टिंग की ट्रेनिंग ली। जो कुछ भी खेतों में देखा-सीखा, उसे एक हजार फ्रेम्स में अपने हाथ से बनाया। सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर से मदद ली। अंशुल अब अपनी फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। 
 
“लैपट’को 25 नेशनल-इंटरनेशनल अवाॅर्ड
 
अंशुल की बनाइ फिल्म लैपट को 25 नेशनल और इंटरनेशनल अवाॅर्ड मिल चुके हैं। छह मिनट की इस शॉर्ट मूवी को उन्होंने मोबाइल से शूट किया है। इसके अलावा अंशुल की बनाई गेट टू हैवन, लैपट रिटर्न्स, दि ब्लाइंड इमेज, दि अनसीन डिजास्टर और फ्लिप बुक आर्ट को देश में कई अवाॅर्ड मिले चुके हैं।  
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