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आठ महीने के काम और सोशल ऑडिटिंग से डरे आप के सांसद

6 वर्ष पहले
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आमआदमी पार्टी ने पंजाब में लोकल बॉडी चुनाव मंे हिस्सा लेने से इंकार कर दिया है। इस फैसले से विरोध के स्वर उठ खड़े हुए हैं। पार्टी काडर में इस बात को लेकर हैरानी है कि इतना बड़ा फैसला आखिर पार्टी ने क्यों लिया? जबकि यह एक बड़ा मौका था जब आम आदमी पार्टी नगर पंचायतों से लेकर बड़े महानगरों तक हर बूथ पर अपनी पैठ बना सकती थी। वजह, आप सांसद सोशल ऑडिटिंग से डरे हुए हैं। उनके आठ महीने का कार्यकाल ही चुनाव लड़ने से कदम रोक रहा है।

बता दंे कि दिल्ली में नगर निगम और पालिकाओं के चुनाव को लेकर हुई मीटिंग में आप के पंजाब संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर इस बात के हामी थे कि चुनाव लड़ना चाहिए। लेकिन, पता चला है कि उन्हें बता दिया गया कि पार्टी के चारों सांसद ये नहीं चाहते। इस बात की पुष्टि पार्टी के सीनियर नेता ने भी की है। लेकिन, अपना नाम छपवाने से साफ मना कर दिया।

मैदानछोड़ने की क्या वजह:

साल2013 में दिल्ली में सरकार बनाने के बाद पार्टी को पंजाब में बड़ा रिस्पाॅन्स मिला। पंजाब की राजनीति में बदलाव चाहने वालों ने लोकसभा के चुनाव में पार्टी की झोली में चार सांसद डालकर साबित कर दिया कि यहां के लोग नई तरह की राजनीति चाहते हैं। पार्टी को उन संसदीय क्षेत्रों में भी भारी रिस्पाॅन्स मिला, जहां पार्टी के उम्मीदवारों को कोई जानता तक नहीं था। लुधियाना में आप दूसरे नंबर पर रही। आजाद उम्मीदवार सिमरजीत बैंस के कारण पार्टी उम्मीदवार एचएस फूलका बहुत कम मतों के अंतर से रवनीत सिंह बिट्टू से हार गए। कई नेता तो यहां तक कहते हैं कि संसदीय चुनाव में कई ऐसे गांव रहे जिनमें हमने पहुंच तक नहीं की। लेकिन, भारी वोट मिले। संसदीय चुनाव को बीते आठ महीने से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन, पार्टी का बूथ लेवल पर स्ट्रक्चर तैयार ही नहीं हुआ है।

^पार्टी वर्कर दिल्ली चुनाव में बिजी थे। पार्टी का स्ट्रक्चर कई जिलों में खड़ा कर दिया है। लेकिन, चूंकि पार्टी नई है इसलिए समय लग रहा है। दिल्ली का चुनाव जीतने के बाद लोगों की हमसे उम्मीदें बढ़ जाएंगी। हम बहुत सोच समझकर कदम उठा रहे हैं। हम धूरी का उपचुनाव जरूर लड़ेंगे। -डाॅ.धर्मवीरगांधी, सांसद, आम आदमी पार्टी।

संसदीय चुनाव में पंजाब को छोड़कर कहीं और पार्टी को रिस्पाॅन्स मिलने के कारण पार्टी के सांसद कहीं एकजुट दिखाई नहीं दिए। अरविंद केजरीवाल के संसदीय चुनाव में हारने के कारण पार्टी का एक बड़ा वर्ग निराश होकर बैठ गया। सांसदों हारे हुए उम्मीदवारों ने भी उन तक पहुंच नहीं की। अकाली भाजपा सरकार के खिलाफ किसी मुद्दे पर उन्होंने कोई कैंपेन खड़ी नहीं की। ऐसे में स्थानीय निकाय चुनाव की लड़ाई जो बिल्कुल डोर टू डोर होकर लड़ी जाती है, पार्टी किसके सहारे लड़ती? यही सोचकर पार्टी ने पैर पीछे खींच लिए। लेकिन, पार्टी अपने बचे खुचे काडर को यह बताने में नाकाम है कि उन्हें किसके आसरे छोड़ दिया गया है। पार्टी के पंजाब संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर ने आज पूरा दिन फोन बंद रखा। बताया जा रहा है कि वह लोगों के फोन सुनकर तंग गए हैं। पार्टी के एक सीनियर नेता ने कहा, पार्टी सांसद भी यह नहीं चाहते कि चुनाव लड़ें। वह अपनी ऑडिटिंग से डरते हैं। डॉ.धर्मवीर गांधी और एचएस फूलका को छोड़कर कोई सांसद अपने इलाके में नहीं गया। भगवंत मान तो केवल संसद में ही बोलते नजर आए।