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इन्होंने गांव को पहुंचा िदया शहर-शहर में
सूरजकुंड में दिखाई पंजाब-हिमाचल की झलक
फोकइंटीरियर, झरोखे, फुलकारियां, मिट्टी की दीवारें, पपेट्स, मिरर वर्क, म्यूरल्स, पुरानी गांवों से जुड़ी लुप्त हो चुकी चीजें, ट्रेडिशनल आर्ट और स्कल्प्चर्स को फोक आर्ट के जरिए लोगों तक पहुंचा रहे हैं क्रिएटिव आर्ट डायरेक्टर एन के साथी। करीब 40 साल से वे यह काम कर रहे हैं। 1975 में जब वे चंडीगढ़ आए। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि फोक आर्ट के विभिन्न रंगों को समेटे फेस्टिवल्स ऐसे भी सजाए जा सकते हैं। इससे पहले फेस्टिवल्स टेंट और टेबल्स तक सीमित थे। साथी ने लोगों को इस नए कॉन्सेप्ट से वाकिफ करवाया। अपने कला से जुड़े सफर की कहानी साझा कर रहे हैं एन के साथी।
इंदिरागांधी ने भी सराहा काम
लखनऊके गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट से ग्रेजुएट होने के बाद एन के साथी दिल्ली गए और कमला देवी चट्टोपाध्याय के नायिका ट्रस्ट से जुड़ गए। भारत में फोक आर्ट को प्रोमोट करने के लिए कमला देवी चट्टोपाध्याय का अहम रोल है। बताते हैं, यहीं मेरे करियर को नई दिशा मिली, बहुत कुछ सीखा और यहां रहते मैंने लोधी होटल, अशोका, ताज आदि में कई फोक थीम पर प्रोजेक्ट्स किए। 1975 की बात है तब पंजाब टूरिज्म डिपार्टमेंट की डायरेक्टर रवनीत कौर थी जो बेहद कला प्रेमी थी। उन्होंने मेरा काम देखा तो इतना पसंद आया कि मुझे चंडीगढ़ आने का न्यौता दिया। यही से मेरी नई शुरुआत हुई। 1975 में कांग्रेस सेशन के दौरान इंदिरा गांधी जी के चैम्बर का इंटीरियर मैंने फोक स्टाइल में डिजाइन किया, उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने मुझे दिल्ली आकर सफदरगंज स्थित अपने घर को सजाने का न्यौता दिया। एनजीसीसी की ओपनिंग पर मैंने पटियाला में शीश महल को ट्रेडिशनल पंजाबी अंदाज से सजाया। राजीव गांधी तब खास मेहमान थे, उन्होंने भी काम को खूब सराहा। दो साल तक गवर्नमेंट जॉब की और फिर छोड़ दी। जॉब की सीमाएं मेरी क्रिएटिविटी में बाधा बन रही थी। तब फ्रीलांस काम शुरू किया। 1992 तक एनजीसीसी के सारे फेस्टिवल, चंडीगढ़ कार्निवाल, एग्जिबीशन, अपना उत्सव की प्लानिंग और डिजाइनिंग सबकुछ करता रहा। अब भी करता हूं। इस दौरान पूरे देश से बहुत ऑफर मिलने लगे। अभी हाल ही में गुवाहाटी में आईटीएफटी का बहुत बड़ा जहाजनुमा मॉडल बनाकर लौटा हूं।