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  • \"साहित्य पढ़ें ही नहीं, जीवन में भी ढालें\'

\"साहित्य पढ़ें ही नहीं, जीवन में भी ढालें\'

7 वर्ष पहले
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हमजैसासाहित्य पढ़ते हैं, वैसी ही हमारी सोच हो जाती है। अच्छा साहित्य पढ़ना तो ठीक है, लेकिन उसको अपने जीवन में उतारना भी जरूरी है। ये कहना था थेरीप्यूटिक रेजिडेंशियल केयर सर्विसेज यूएसए के प्रेसिडेंट डॉ. हरमेश कुमार का। वे डिपार्टमेंट ऑफ ईवनिंग स्ट्डीज में साइकोलॉजिकल एंड क्लीनिकल इफेक्ट ऑफ रीडिंग लिट्रेचर पर लेक्चर दे रहे थे। डॉ. कुमार ने कहा कि 25-30 साल पहले वे एक स्कूल में गए, जो नया शुरू हुआ था। अरदास के समय एक बच्चा जपुजी साहिब का पाठ करने के बजाय शरारत कर रहा था। टीचर ने उसे थप्पड़ जड़ दिया। प्रेम सिखाने वाली गुरवाणी से टीचर ने खुद प्रेम नहीं सीखा। ऐसे साहित्य का फायदा क्या।