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प्रेम ईश्वर भी है और भक्ति भी: मुनि आलोक
प्रेमसंसारमें अनमोल है। इसे कितना भी खर्च करो, लुटाओ, यह कम नहीं होता। प्रेम ही ईश्वर है और प्रेम ही भक्ति है। बिन प्रेम के यह सारा संसार अधूरा है। आज संसार के हालात बदतर होते जा रहे हैं। इसका यही कारण है घरों में प्रेम दूर होता जा रहा है। हर व्यक्ति अपने में खोया हुआ है। कोई किसी के साथ नहीं, सब स्वार्थ के साथ दूसरे से जुड़े हैं। इस स्वार्थ को अंदर से निकालना होगा, तभी धरती फिर से गुलजार हो सकती है। ये प्रवचन मुनि विनय कुमार आलोक ने दिए।
जिसघर में प्रेम, वहां स्वर्ग है: जिसघर में प्रेम है, वहां स्वर्ग है, लेकिन दिलों में दूरियां बढ़ रही हैं। सम्मान की प्रवृत्ति खत्म होती जा रही है। यही कारण है कि इंसान स्वार्थ को आगे रखकर काम कर रहा है। चाहे उसके काम से दूसरे को नुकसान हो रहा हो। इसीलिए जब-जब संसार में धर्म की हानि है, पाप हावी होने लगता है और इसके बाद ईश्वर संसार से अंधकार को दूर करने के लिए आता है।
मुनिप्रवर ने कहा- बेशक कितनी भी पाठ-पूजा कर लो, लेकिन जब तक मन में प्रेम नहीं जागेगा, तब तक पूजा पाठ बेकार है। जितना हो सके, अच्छे सदाचारी लोगों के साथ रहो। उन्होंने कहा- क्राेध एेसी बीमारी है, जो मनुष्य को निंदा का पात्र बना देती है। क्रोध व्यक्ति का स्वभाव नहीं है। यह विकार है। बड़े आश्चर्य की बात है कि मनुष्य शांत और सहज क्यों नहीं रहना चाहता। शांत और सहज रहने में जो आनंद है, जो सुख है, वह अशांत हो जाने पर कैसे हो सकता है। क्रोध सिर्फ प्रेम, करुणा से ही के विजय पाई जा सकती है। बिन करुणा और प्रेम के इंसान-इंसान नहीं हैं। प्रेम करुणा की भाषा तो बेजुबान पशु- पक्षी भी समझते हैं।
क्रोधीव्यक्ति से घृणा नहीं: क्रोधीव्यक्ति से घृणा नहीं, सहानुभूति रखनी चाहिए। एेसा इसलिए, क्योंकि वह बीमार है और बीमार से घृणा नहीं सहानुभूति करने की जरूरत है। जिस व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी हो उसे सुबह क्रोध करने से बचना चाहिए। अगर वह किसी से बातचीत करे तो वह क्रोध से बच सकता है। परिवार में अगर कोई क्रोधी बन जाए, तो उसकी बात काटने से उस से टकराने से बचना चाहिए। क्रोधी व्यक्ति का विवेक से कोई संबंध नहीं होता, उसे लोक-लज्जा की भी परवाह नहीं होती।