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नन्हे हार्ट पेशेंट्स का इलाज करेंगे यूएस से आए डॉक्टर असीम
बच्चोंकी जिंदगी बचाने के लिए भारतीय मूल के डॉक्टर ने भारत का रुख किया है। हालांकि विदेशों में बच्चों की हार्ट सर्जरी के लिए उन्हें काफी रकम मिलती है। इसके बावजूद पैसे का लालच छोड़कर अपने देश के बच्चों की जिंदगी बचाने का बीड़ा उठाया है डॉ. असीम आर श्रीवास्तव ने। डॉ. असीम का कहना है कि उन्होंने एमबीबीएस करने के बाद विदेशों मंे पढ़ाई की। जब उन्हें इस बात की जानकारी मिली कि भारत में बच्चों की हार्ट सर्जरी के डॉक्टर बहुत कम हैं, तो उन्होंने भारत आकर यहां के बच्चों का उपचार करने की ठानी।
जब उन्हें यह पता चला कि पंजाब, हरियाणा चंडीगढ़ में दिल के मरीज बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही और ज्यादातर का इलाज भी समय पर नहीं हो रहा है, तो उन्होंने चंडीगढ़ में ही बसने का मन बनाया और पंचकूला में अलकेमिस्ट अस्पताल के साथ संपर्क किया। अलकेमिस्ट के सहयोग से बच्चों की हार्ट सर्जरी की जिम्मेदारी ली। उनका कहना है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को इलाज कर वह उनकी जिंदगी बचाना चाहते हैं।
डॉ. असीम का कहना है चंडीगढ़ में ऐसे बच्चों का उपचार केवल पीजीआई में होता है। पीजीआई के पास पहले ही रश है। वहां 2 साल की वेटिंग चल रही है। नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत पीजीआई से संपर्क किया गया है ताकि वेटिंग वाले बच्चों का इलाज हो।
डाॅ. असीम ने चंडीगढ़ के डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेज डॉ. वी.के. गगनेजा को बच्चों की सर्जरी के लिए अपने आपको पेश किया। डाॅ. असीम ने एचआरएचएम के तहत मिलने वाली राशि में ही सर्जरी करने को लिखा है।
डॉ. असीम का कहना है कि उनकी प|ी बाल रोग विशेषज्ञ हंै। उनसे जब यह पता चला कि बच्चों की हार्ट सर्जरी करने वालों की संख्या कम है तो उन्होंने इसी पर ही काम करने का मन बना लिया और वे बच्चों के हार्ट स्पेशलिस्ट बन गए। उन्होंने फिलाडेल्फिया चिल्ड्रन हॉस्पिटल से बच्चों की हार्ट सर्जरी की ट्रेनिंग ली।
डॉ. असीम
डॉ. असीम का कहना है कि देश में हर 100 बच्चों में से 10 बच्चों को दिल की बीमारी है। इनमें कई तरह की प्रॉब्लम्स पाई जाती हैं। कुछ में तुरंत ऑपरेशन करना पड़ता है। वहीं, कुछ बच्चों को समय मिल जाता है। इसी के चलते देश में एेसे बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। बच्चों के दिल के ऑपरेशन करने वाले डाॅक्टर्स की कमी है। इसीलिए प्राइवेट डाॅक्टर्स मोटी रकम लेते हैं। भारत सरकार द्वारा नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत ऐसे बच्चों के उपचार के लिए 70 हजार रुपए की राशि तय की गई है। उन्होंने इसी राशि में ही बच्चों का उपचार करने का बीड़ा उठाया है ताकि बच्चों के अभिभावकों पर बोझ पड़े और बच्चों की जिंदगी बचाई जा सके।