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जिस दिन टेंडर, फाइनेंशियल बिड उसी दिन, एजेंडा भी पास
सेलवेलकोकिसी भी हालत में एडवर्टाइजमेंट फीस से छूट देने के लिए निगम के अफसरों ने वो सभी काम एक दिन में निपटा दिए जिनमें आम तौर पर दो महीने का समय लगता है। फाइनेंशियल बिड खोलने से लेकर सेलवेल को ही टेंडर अलॉट करने का काम 9 अगस्त 2007 को ही कर दिया गया। जिस फाइनेंस एंड कॉन्ट्रैक्ट कमेटी के पास सिर्फ 35 लाख रुपए तक का टेंडर अलॉट करने की पावर थी, उसने 5.54 करोड़ का टेंडर सेलवेल को अलॉट कर दिया। इस पूरे घोटाले में नगर निगम को 14 करोड़ 32 लाख 74 हजार 300 रुपए का नुकसान हुआ है। सीबीआई की जांच में ये खुलासे हुए हैं। सीबीआई ने बुधवार को ही इस केस में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर आरसी दीवान, रिटायर्ड सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर सीता राम अग्रवाल और चीफ इंजीनियर एसके बंसल के खिलाफ केस दर्ज किया था। सेलवेल के डायरेक्टर रुस्तम और जनरल मैनेजर विश्वजीत दत्ता का नाम भी एफआईआर में है।
{सेलवेल ने 8800 रुपए, आउटडोर कंपनी ने 11 हजार रुपए हर टॉयलेट ब्लॉक की मेंटेनेंस के हिसाब से टेंडर भरा।
{सेलवेल और आउटडोर के टेंडर्स की फाइनेंशियल बिड खुली।
{कंपैरेटिव स्टेटमेंट तैयार की गई।
{सेलवेल ने नगर निगम से नेगोसिएशन किया।
{सेलवेल लोएस्ट वन (एल वन) घोषित किया गया, यानी इसकी बिड सबसे कम थी।
{फाइनेंस एंड कॉन्ट्रैक्ट कमेटी का एजेंडा तैयार हुआ।
{कहा गया कि सेलवेल से एडवर्टाइजमेंट फीस और लाइसेंस फीस नहीं ले रहे।
{एफएंडसीसी के एजेंडे में एडवर्टाइजमेंट फीस और टैक्स के बारे में नहीं लिखा गया।
{एफएंडसीसी में एजेंडा पास करवा दिया गया।
इस काम में दो महीने लगते|पब्लिक हेल्थविंग के अफसरों ने जो काम एक दिन में कर दिया उसमें कम से कम दो महीने लगते हैं। टेंडर मांगने से लेकर फाइनेंशियल बिड खोलने, कंपनी से नेगोशिएट करने, एफएंडसीसी में पॉलिसी का एजेंडा लाने, हाउस में पास करवाने, अलॉटमेंट और एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रूवल में दो महीने का समय लगता है।
नगर निगम के पब्लिक हेल्थ विंग के एक्सईएन आरसी दीवान ने 40 और 46 टॉयलेट ब्लॉक का टेंडर तो तय शर्तों से मांगा था, लेकिन कंडीशंस सेलवेल कंपनी की मानी गईं। टेक्निकल बिड आई ही नहीं, फाइनेंशियल बिड खोल दी गई। सेलवेल को फेवर करने के लिए एक ही दिन 9 अगस्त को ये सारे काम हो गए-
9 अगस्त 2007 को ऐसे खेला गया घपले का खेल
हुआ ये