‘अच्छे सुनने वालों की भी जरूरत है’
क्लासिकलऔर लाइट म्यूजिक, शुभ्रा दोनों में माहिर हैं। संगीत का शुरुआती प्रशिक्षण इन्हें इनके चाचा हारमोनियम प्लेयर रविंद्र तलेगांवकर से मिला है। पिता पंडित केशव आर तलेगांवकर और मां प्रतिभा केशव से भी इन्होंने संगीत का शिक्षा ली। चार साल की उम्र में इन्होंने अपनी पहली परफॉर्मेंस मुंबई में राग बागेश्वरी गाकर दी थी। अब शुभ्रा 25 साल की हैं और कई नेशनल और इंटरनेशनल म्यूजिक फेस्टिवल्स में परफॉर्म कर चुकी हैं। इनके नाम कई अवॉर्ड्स भी हैं। इनमें साल 2013 में मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर से मिला यंग आर्टिस्ट स्कॉलरशिप अवॉर्ड खास है। शुभ्रा से हुई खास बातचीत।
कहने लगीं, ‘मेरे दादा स्वर्गीय पंडित रघुनाथ तलेगांवकर ने साल 1960 में आगरा में संगीत कला केंद्र स्थापित किया था। तब से लेकर अब तक वहां भी प्राचीन कला केंद्र की तरह मासिक बैठकें होती हैं। मेरे चाचा, ताया, बुआएं। सब म्यूजिक की फील्ड में हैं। कोई परफॉर्मर है तो कोई एकेडेमिक्स में। सोते, जागते म्यूजिक कान में पड़ता ही रहता है। इसलिए भले ही इंग्लिश में एमए किया, पर म्यूजिक को करियर के तौर पर ऑप्ट करने की सोची।’ कहने लगीं अब परफॉर्मेंसेज में काफी बदलाव आया है। पहले जो सिखाया जाता था, वही गा देती थी। पर अब इंप्रोवाइज करना गया है और क्लासिकल म्यूजिक में जितना इंप्रोवाइजेशन होता है, उसका अंदाज उतना ही निखरता है। इन दिनों क्लासिकल म्यूजिक यंगस्टर्स की चाॅइस बनता जा रहा है। वह खुद ऐसी कंपोजीशंस तैयार करती हैं जो यंगस्टर्स को अपनी ओर अट्रेक्ट करती हैं। इस पर उन्होंने अपनी सिंफनी, \\\"आनंदानुभूति\\\' और \\\"जीवन संदेश\\\' की बात की। इन 20 मिनट की कंपोजीशंस में इन्होंने मृदंग, तबला, ऑक्टोपैड, स्पैनिश गिटार जैसे इंस्ट्रूमेंट्स और आलाप, ख्याल आदि के फ्यूजन से सिंफनी तैयार की हैं। इसे यंगस्टर्स ने काफी सराहा भी है।
गजल गीत भी गाना पसंद
शुभ्रा को प्योर क्लासिकल के अलावा गजल, गीत, भजन गाना भी पसंद है। वहीं सुनने में इन्हें ठुमरी ज्यादा पसंद है। इनके मुताबिक वही लोग टिके रहते हैं जो वाकई में अच्छे परफॉर्मर होते हैं। अच्छे परफॉर्मर्स के साथ, सुनने वाले भी अच्छे हों, इस पर भी काम करने की जरूरत है।
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