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'दिलचस्पी से होती है सीखने की शुरुआत'

9 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. दिलचस्पी से ही सीखने की शुरुआत होती है, आप इंटेलिजेंट हैं तो जरूरी नहीं कि सब कुछ सीख जाएंगे, यदि आप मानसिक तौर पर चैलेंज्ड हैं, तब भी आपके पास दिमाग है और आप सीख सकते हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी के लॉ ऑडिटोरियम में अभिनेता, थियेटर आर्टिस्ट डॉ. मोहन अगाशे ने सेहत और सिनेमा पर बात करते हुए ये विचार रखे। डॉ. अगाशे ने सिनेमा एवं मानसिक सेहत का संबंध बताया। डॉ. अगाशे ने साइकोलॉजिकल टर्म में सिनेमा का उपयोग बताया।

अच्छी फिल्म वह है जो सोचने पर मजबूर कर दे
डॉ. अगाशे ने कहा कि अच्छी फिल्म का अर्थ है, वह फिल्म जो आपको सोचने को मजबूर करे। सिनेमा का भाव हम मनोरंजन और किताबों का भाव हम सीखने से रखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। अब तो न्यूज भी एंटरटेनिंग हो गई है, जबकि सिनेमा कहीं न कहीं एजुकेटिव। उन्होंने साउंड और इमेज की कला का पूरा उपयोग करने के लिए कहा।
डॉ. अगाशे ने साइकेट्री की तकनीक क्रफ्रेम ऑफ रेफरेंस का हवाला भी दिया, जो डॉक्टरों के लिए एक तकनीक है और मरीज के लिए आपबीती। सिनेमा इसमें लाभदायक हो सकता है।

डॉ. अगाशे ने इसके लिए स्पैरो : व्हाट इज दिस फिल्म भी दिखाई। इसमें एक अल्जाइमर पीडि़त पिता और बेटे की बातचीत दिखाई गई है कि कैसे एक बेटा अपने पिता के बार-बार सवाल पूछने पर परेशान हो जाता है। इस पर पिता अपनी डायरी बेटे को पढऩे को देता है, ताकि वह जान सके कि बेटे के बचपन में उसने इसी सवाल का जवाब बार-बार पूछने के बावजूद उसने बड़े ही धैर्य से दिया था। एक अन्य फिल्म के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया कि अपंग लोगों के साथ सामान्य तरीके से व्यवहार करना चाहिए।

मजाकिया लहजे में दिए सवालों के जवाब
90 फीसदी सिनेमा हिंसात्मक है, क्या करें?
अपना सिनेमा समझदारी से चुनें। मानता हूं कि इस समय भारतीय सिनेमा न कल्पना है और न ही रियलिटी, लेकिन चॉइस आपकी है।

मोटिवेशन अंदर से आती है आपको नहीं लगता?
जानकारी देने के लिए थैंक्यू। बेशक मोटिवेशन अंदर से ही आती है, लेकिन उसके लिए प्रयास भी कामयाब रहते हैं।

पेरेंट्स मार्केट के हिसाब से निर्णय करना चाहते हैं।
मैंने एमडी की, क्योंकि यूनिवर्सिटी जाना चाहता था। एक्सट्रा करिकुलर में भाग लिया। जीवन में आप क्या करना चाहते हैं, किससे संतुष्टि मिलती है उसे याद रखें, लेकिन सरवाइवल भी जरूरी है।

क्या साइकेट्री बोझिल नहीं हो गई है?
आप कह सकते हैं। मेडिकल स्टूडेंट्स के साथ दूसरे और तीसरे साल की पढ़ाई में यह समस्या आती है कि वह खुद को मरीज समझने लगते हैं। खासतौर पर पैथोलॉजी पढ़ते हुए, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।

सरकार के विज्ञापन दिलचस्प क्यों नहीं होते?
वे अपना पूरा बजट इस्तेमाल नहीं करते हैं।

किस तरह के सिनेमा और कौन सी फिल्म को आप अच्छा मानते हैं?
ये निजी प्रश्न हैं, बाद में मिल कर पूछना।
आपने अभिनय कहां से सीखा ?
मैं अभिनय अपने मरीजों से सीखता हूं। पैरानॉइट पेंशेंट आपके सामने सबसे आसान जरिया हैं। अभिनय को कहने का। आप अपने जीवन में आस-पास से जुड़ी चीजों से ही सीखते हैं।

आप सब्जेक्टिव होने की बात करते हैं और हमसे ऑब्जेक्टिव की बात की जाती है?
रिसर्च के दौरान ऑब्जेक्टिव रहो और आम जिंदगी जीते हुए सब्जेक्टिव।

आपको नहीं लगता कि इस समय सिनेमा मैच्योर हो रहा है?
सिनेमा जिस दिन मैच्योर हो जाएगा, उस दिन समाप्त हो जाएगा। फिल्मों से संबंधित एक सवाल पर उन्होंने कहा कि जैसे हर अखबार, हर शहर में अपना एडिशन खोल रहा है, लेकिन पढ़ा नहीं जा रहा। वही हाल सिनेमा का है। हर साल ७०० फिल्में बन रही हैं तो सभी कैसे देखी जाएंगी।