पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

दरबार साहिब परिसर में सूख चुकी दुख भंजनी बेरी फिर से हरी-भरी

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
अमृतसर। दरबार साहिब में सूख चुकी दुःख भंजनी बेरी फिर से हरी हो रही है। दोबारा नीचे से फूट गई है। ऐसा पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट के प्रयासों से हुआ है। साइंटिस्ट 2006 से दरबार साहिब परिसर में दुःखभंजनी बेरी की संभाल कर रहे हैं। एसजीपीसी के महासचिव सुखदेव सिंह भोर ने बताया, बेरी के सूख जाने के बाद कमेटी ने इसे बचाने के प्रयास शुरू कर दिए थे।
दुःखभंजनी बेरी के साथ उस स्थान को बदला जा रहा है, जहां श्री अखंड पाठ साहिब रखे जाते हैं। बाकी पेड़ों पर भी साइंसदानों की मेहनत रंग लायी दरबार साहिब परिसर में दुःखभंजनी बेरी के अलावा बेर बाबा बुड्ढा जी, अकाल तख़्त के सामने लगे इमली के पेड़ और दर्शनी ड्योढ़ी के पास इलाइची बेरी की भी साइंटिस्ट 2006 से संभाल कर रहे हैं।
बेर बाबा बुड्‌ढा जी के नीचे बैठकर बाबा बुड्ढा जी दरबार साहिब के सरोवर की कारसेवा करवाते थे। इलाइची बेरी के साथ ही सुक्खा सिंह और महताब सिंह ने मस्सा रगड़ का सर काटने से पहले अपने घोड़े इस बेरी के साथ बांधे थे। इमली के पेड़ को साल 1984 में दरबार साहिब पर हुए हमले के दौरान काफी नुकसान पहुंचा था। इस पेड़ के साथ महाराजा रंजीत सिंह ने सज़ा के लिए अपने-आप को बंधवाया था। भोर ने बताया, इस बार बेरियों पर बहुत बड़ा भूर आया था।

कई पेड़ खत्म हो चुके है : पंजाबी साहित्य और सिख विद्वान डाॅ. बलविंदर कौर ने सिख इतिहासकार प्रिंसिपल सतबीर सिंह के हवाले से बताया, बहुत साल पहले रामसर सरोवर के पास जहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ बांधी गई थी वहां पर पांच प्रकार के पेड़ जिसे पंचवटी के नाम से भी जाना जाता था। इनमेंं जंढ़, बेरी, बोहड़, पीपल, अंजीर इत्यादि शामिल थे। इस पंचवटी से कई पेड़ खत्म हो चुके हैं।
क्यों सूखी थी 500 साल से ज्यादा पुरानी दुखभंजनी बेरी, अब कैसे हरी हुई ?
भोर ने बताया, श्रद्धालु 500 साल से भी ज्यादा पुरानी दुखभंजनी बेरी को प्रसाद वाले हाथ लगा कर माथा टेकते थे। जिसके कारण बेरी को नुकसान होता रहा। पीएयू के साइंटिस्ट डाॅ. पुष्पिंदर सिंह औलख ने बताया, यूनिवर्सिटी के साइंटिस्टों की एक टीम पिछले दो साल से ही इसको बचाने में लगी हुई थी। इसके तहत सबसे पहले दुःखभंजनी बेरी के साथ-साथ दरबार साहिब परिसर के तमाम उन पुराने पेड़ों के इर्द-गिर्द स्टील और फाइबर शीट की बेरीकेटिंग की गई है ताकि श्रद्धालु इन पेड़ों को हाथ न लगा सकें।
क्योंकि ज्यादातर श्रद्धालु प्रसाद लेने के बाद इन पेड़ों से माथा टेकते समय हाथ लगाते थे जिससे इन पेड़ों के मोसाम बंद हो जाते थे और वहां पर कीड़े और बीमािरयों ने इन पर अटैक किय। इससे इनको नुकसान होता आ रहा था। यूनिवर्सिटी के अलग-अलग विभागों के साइंटिस्टों की टीमें इनका इलाज करते रहे। कीड़े मार दवाइयों और स्प्रे का भी इस्तेमाल किया गया था। डाॅ. औलख ने बताया, हर मई-जून के महीने में इनकी कटाई करवाई जाती है। दुःखभंजनी बेरी का नाम चौथे गुरु रामदास जी ने रखा था। पूरी दुनिया से लोग बेरी के पास सरोवर में स्नान करने आते हैं।
(फोटो- दरबार साहिब परिसर में सूख चुकी दुख भंजनी बेरी के नीचे से नई कलम फूटी है।)