( जेबीटी टीचर संजय 34 की उम्र में 26 बार ब्ल्ड डोनेशन कर चुके हैं।)
मोहाली। शरीर नष्ट होने के बाद मेरी अांखें और अन्य बॉडी पार्ट्स मिट्टी में ही तो मिलने हैं। इससे अच्छा है मरने के बाद मेरी आंखों से कोई नेत्रहीन यह दुनिया देख सके। यहीं नहीं मैंने तो मरने के बाद अपना शरीर दान करने की घोषणा भी कर दी है। इसमें मेरी पत्नी भी मेरा बखूबी साथ निभा रही है। मुझे देख उसने भी पहले ब्लड डोनेट करना शुरू किया, उसके बाद नेत्रदान करने के लिए सारी कागजी कार्रवाई पूरी कर ली है। अब शरीर को दान करने की योजना बनाई है।
यह कहना है कजेहड़ी के गवर्नमेंट हाईस्कूल में पढ़ाने वाले
34 साल के संजय जांगिड़ का। वह 26 बार ब्लड डोनेट कर चुके हैं। उनकी पत्नी लक्ष्मी रानी ने भी बॉडी के पार्ट्स दान करने की घोषणा की है। जेबीटी टीचर संजय मूल रूप से सिरसा के मंडी डबवाली के रहने वाले हैं। कजेहड़ी स्कूल में पढ़ाते हैं और उनकी पत्नी रयात एंड बहारा यूनिवर्सिटी में कलेरिक्ल पोस्ट पर हैं। वे अपने पति का हर तरह से हौसला बढ़ाती हैं।
आंखें चेक कराने गया तो देखा एक अंधा भीख मांग रहा है
जीएमसीएच-32 में अपनी आंखें चेक कराने के लिए गया था। वहां पर लंबी लाइन थी। अस्पताल के बाहर एक अंधा भीख मांग रहा था। वह बोल रहा था कि कुछ तो रहम करो इस अंधे पर, खाने के लिए कुछ पैसे दे जाओ। संजय के मन में विचार आया कि यदि इस अंधे को किसी की आंखें मिल जाए तो यह भी दुनिया देख सकेगा। घर जाकर पत्नी से बात की। दोनों ने अांखें दान करने के लिए अगले दिन यानी 29 अक्तूबर 2009 में जीएमसीएच-32 में कागजी कार्रवाई पूरी की।
फौजी बनकर देश की सेवा करना चाहता था
संजय ने बताया कि वह दोनों पति-पत्नी ने यह मन बनाया है कि जीएमसीएच-32 में अपनी बॉडी भी डोनटं कर देंगे। वह चाहते हैं कि उनके अंग बाॅर्डर पर लड़ रहे सिपाहियों को मिलें जो देश की रक्षा करते हुए या तो अंगहीन हो चुके हैं या फिर किसी पर टिके हुए हैं। उन्होंने कहा कि जिंदगी का मकसद है देश की सेवा करना, लेकिन फौजी नहीं बन पाया।