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डाउनलोड करेंचंडीगढ़. मेरे पास कोई जैक नहीं है वरना मुझे भी पक्की सरकारी नौकरी और भीम अवॉर्ड मिल गया होता। वर्ल्ड वुमन बॉक्सिंग चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता और दो बार एशियन चैंपियनशिप में पदक जीत चुकी रेवाड़ी की रेणु की बातों में सच्चाई भी है।
यही नहीं 6 बार हरियाणा की तरफ से नेशनल चैंपियन बनी रेणु को हरियाणा ने ही भुला दिया। हरियाणा सरकार और उसका स्पोट्र्स डिपार्टमेंट डोप टेस्ट में पॉजिटव रहे खिलाडिय़ों को भीम अवॉर्ड दे सकता है लेकिन रेणु को नहीं जिसकी अचीवमेंट इतनी बड़ी है। हालात से लड़ रही रेणु इन दिनों झज्जर में डीसी रेट(10 हजार प्रतिमाह) पर कोचिंग करने पर मजबूर है। भास्कर से बातचीत में रेणु ने कहा कि मैने दो बार भीम अवॉर्ड के लिए अप्लाई किया लेकिन मेरी एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी, जबकि मेरे से कम अचीवमेंट वाले खिलाड़ी यह पुरस्कार
लिए बैठे हैं।
मैने अभी हरियाणा स्पोट्र्स डिपार्टमेंट में कोच पद के लिए एप्लीकेशन भरी है, मुझे बस यही आखिरी उम्मीद है। रेणु कई बार सीएम हुड्डा से भी मिल कर नौकरी देने की गुहार लगा चुकी है लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। पिछले दिनों ही वह हुड्डा से मिलने दिल्ली भी गई लेकिन सीएम से नहीं मिल पाई।
ग्रेडेशन तक नहीं की
वल्र्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक का सर्टिफिकेट लेकर पिछले साल जब रेणु गुडगांव के जिला खेल अधिकारी के पास गई तो, उसने इसे नकली ही बता दिया। कोच पद के फॉर्म भरने से पहले ग्रेडेशन करवानी जरूरी होती है और रेणु अधिकारियों को समझाती रही कि आप जांच कर लें लेकिन अधिकारी टस से मस नहीं हुए। हार कर रेणु ने अपने साई के डिप्लोमा सर्टिफिकेट लगा कर फॉर्म भरा।
भीम अवॉर्ड क्यों नहीं, कोई बताता नहीं
2007-8 और 2009-10 में रेणु ने दो बार भीम अवॉर्ड के लिए अप्लाई किया लेकिन नहीं मिला। रेणु ने चंडीगढ़ स्थित अधिकारियों को फोन किया और पूछा कि उसे अवॉर्ड क्यों नहीं मिला जबकि उसके पास वल्र्ड चैंपियनशिप का मेडल है। अधिकारियों ने टका सा जवाब दिया कि कमेटी ने डिसाइड किया है। कुछ लोगों ने सलाह दी पैसे दो और लिस्ट में नाम डलवा लो, लेकिन रेणु ने कहा कि इतने पैसे नहीं है और फिर उसकी तो अचीवमेंट है, तो अवॉर्ड बनता है।
सिर्फ 10 हजार सैलरी में चला रही हैं परिवार
झज्जर में किराये के मकान में अपनी 2 साल की बेटी के साथ रह रही रेणु की सैलरी में 4 हजार से ज्यादा तो किराया और बिजली पानी के बिल में ही निकल जाते हैं। उसके बाद गांव में अपने माता-पिता की देखभाल और दवाईयों का खर्चा भी रेणु के जिम्मे है। बकौल रेणु मुझे, लगता है कि बॉक्सिंग चुन कर गलती कि क्योंकि जितना समय इस खेल को दिया, अगर करियर के बारे में सोचा होता, शायद आज यह हालात नहीं होते।
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