चंडीगढ़. हाल ही में हुए तीन लोकसभा और 33 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के नतीजों के बाद भाजपा निराश हुए कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की कोशिशों में जुट गई है। ये नतीजे ऐसे समय पर आए हैं जब हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं और यहां पार्टी का इतना बड़ा जनाधार भी नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के नाम पर मिले जनादेश के बाद प्रदेश में भाजपा कार्यकर्ता और नेता काफी उत्साहित थे। अब उन्हें लगने लगा है कि पड़ोसी राज्य राजस्थान के उपचुनाव नतीजों का असर हरियाणा में जरूर पड़ेगा।
इधर, इन नतीजों को लेकर कांग्रेस के निरुत्साहित कार्यकर्ताओं और नेताओं को कुछ राहत जरूर मिली है। वे मानकर चल रहे हैं कि जैसा विपक्षी दल सोचकर चल रहे हैं प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति उससे काफी बेहतर रहेगी। जबकि प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल इनेलो का दावा है कि इन नतीजों के असर का सर्वाधिक लाभ उसे ही मिलेगा क्योंकि भाजपा का उतना बड़ा संगठन नहीं है और कांग्रेस के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी है।
इन नतीजों के बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर और रोहतक सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने भी भाजपा को टारगेट पर लेते हुए कहा है कि उसके अच्छे दिनों के दावों को मतदाताओं ने नकार दिया है। जबकि भाजपा के प्रदेश चुनाव प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि इन नतीजों को हरियाणा के चुनाव में कोई असर नहीं पड़ेगा। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अमित शाह ने भी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे चुनाव नतीजों से निराश न हों और पूरी ताकत के साथ हरियाणा की सत्ता पर काबिज होने के प्रयासों में जुटें। विजयवर्गीय ने कहा कि हरियाणा में पार्टी कार्यकर्ताओं में कोई निराशा नहीं है, बल्कि वे पूरे उत्साह से सरकार बनाने में जुटे हैं।
इधर, इनेलो नेता उप चुनाव के नतीजों का अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं। इस बार अकेले चुनाव लड़ रही इनेलो की सबसे बड़ी चिंता एंटी कांग्रेस वोटों के बंटने को लेकर ही है क्योंकि तमाम पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। यही वजह है कि दो दिन से इनेलो के तमाम नेताओं ने कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी जोरदार हमला बोला है। इनेलो के राष्ट्रीय महासचिव आरएस चौधरी के अनुसार राज्य में 10 साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त एंटी इनकंबेंसी है और हरियाणा में भाजपा के कमजोर होने से एंटी कांग्रेस वोट इनेलो की ओर शिफ्ट होगा।
भाजपा में चिंता, लेकिन इकरार नहीं
भाजपा खेमा उपचुनाव के नतीजों से चिंतित तो है, लेकिन सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं कर रहा। इसकी तीन वजहें हैं। पहली-इस बार भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस और इनेलो से है। दूसरा-पार्टी ने सीएम पद के लिए कोई प्रत्याशी घोषित नहीं किया है और तीसरा-नेताओं की गुटबाजी से पार्टी को नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद भाजपा नेताओं का दावा है कि मोदी मैजिक के सहारे प्रदेश में वह पहली बार अपने बूते सरकार बनाएंगे।
इतने बदले-बदले क्यों हैं अशोक तंवर के तेवर
उम्मीदवार घोषित करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
आज शाम को स्क्रीनिंग कमेटी की मीटिंग हो चुकी है। कल केंद्रीय चुनाव कमेटी की मीटिंग के बाद कभी भी उम्मीदवार घोषित कर दिए जाएंगे।
क्या आपमें और हुड्डा में टिकट वितरण को लेकर तनातनी है?
ऐसी कोई बात नहीं है। हम दोनों साथ हैं। टिकट जिताऊ उम्मीदवार को ही देने हैं, इसलिए देरी हो रही है।
ऐसा माना जा रहा है कि हुड्डा विरोधी खेमा आपके पक्ष में आ गया है?
ऐसा बिल्कुल भी नहीं। मेरे साथ तो पूरी कांग्रेस खड़ी है। सभी 90 विधानसभा सीटों के कार्यकर्ता मेरे साथ हैं। कोई विरोध नहीं है।
शारदा पर आपकी कठोर बात से क्या ये संकेत हैं कि आप बागियों-हजकां से टूटकर आए विधायकों को टिकट नहीं देंगे?
मेरा स्टैंड आप जानते हैं। मैं अपनी बात बार-बार नहीं दोहराना चाहता। कल मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। (बता दें कि तंवर ने कहा था कि पार्टी को कमजोर करने वालों को टिकट नहीं दिया जाएगा। इन्हें सबक सिखाना जरूरी है। इशारा शारदा राठौर और भाजपा नेताओं में हुई मुलाकात की ओर था।)