चंडीगढ़. पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज से 14 करोड़ के घोटाले का केस चंडीगढ़ की आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया गया है। अब आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई आर्थिक अपराध शाखा ही करेगी।
उधर, सूत्रों के अनुसार एग्रो इंडस्ट्रीज के अफसरों ने लोन जारी करते समय उत्तरप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की जिस जमीन के फर्जी दस्तावेज दिखाकर कंपनी ने करोड़ों रुपए ऐंठे, उसकी लीगल सर्च रिपोर्ट तक नहीं देखी। घोटाले का पता चलने के बाद कंपनी के छह अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किया जा चुका है।
क्या कहती है पुलिस: चंडीगढ़ सेक्टर-26 के एसएचओ अनोख सिंह के अनुसार, अब अगली कार्रवाई और जांच आर्थिक अपराध शाखा ही करेगी।
क्या है लीगल सर्च रिपोर्ट
प्रॉपर्टी कारोबारी और बैंक में रह चुके अधिकारी राजवंत सिंह के अनुसार किसी भी प्रॉपर्टी पर लोन देते समय लोन देने वाले को उस प्रॉपर्टी की लीगल सर्च रिपोर्ट देखनी होती है। इस लीगल सर्च रिपोर्ट में प्रॉपर्टी का पिछले 30 साल तक का रिकॉर्ड देखा जाता है कि उसका रिकॉर्ड सही है या नहीं।
कहीं यह पहले शामलात या किसी अन्य धार्मिक संगठन की तो नहीं रही। अगर उक्त प्रॉपर्टी के टाइटल के बारे में किसी तरह का विवाद आता है तो प्रॉपर्टी पर लोन नहीं दिया जा सकता है। ऐसी विवादित प्रॉपर्टी पर लोने देने से बचने के लिए लीगल सर्च रिपोर्ट अनिवार्य है।
यह है मामला
2 अप्रैल 2004 को रिलायंस पॉलीक्रीट कंपनी के मालिक एसके जैन ने अपना व्यापार बढ़ाने के लिए पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज से 22 करोड़ के लोन के लिए अप्लाई किया था। 3 मई 2006 को अपनी पांच करोड़ की जमीन के दस्तावेज एग्रो फूड कॉपरेरेशन को दिए।
17 सितंबर 2004 को उसे 17 करोड़ 10 लाख रुपए का लोन मंजूर हुआ, इसमें 14 करोड़ रुपए ही उनके खाते में डाले गए। पहले तो वह किस्तों का भुगतान सही ढंग से करता रहा, लेकिन बाद में किस्तें देनी बंद कर दीं। जुलाई 2008 में शक होने पर जांच शुरू हुई। वकील मलिक की ओर से की गई जांच में एसके जैन द्वारा पांच करोड़ की प्रॉपर्टी के दस्तावेज जाली पाए गए।
आईएएस समेत कई अफसर हुए थे चार्जशीट
जांच में पंजाब एग्रो के तत्कालीन एमडी आईएएस अफसर कृपा शंकर, एडिशनल मैनेजिंग डायरेक्टर अमरपाल सिंह, जनरल मैनेजर आरके सिंगला और पंजाब एग्रो फूड गेन्स लिमिटेड के मैनेजर राकेश कुमार की मिलीभगत भी सामने आई।
पंजाब के चीफ सेक्रेटरी ने इन्हें चार्जशीट किया। बाद में आईएएस ऑफिसर चीफ सेक्रेटरी रैंक की अधिकारी रोमिला दूबे द्वारा की गई जांच में पाया गया कि उक्त अधिकारियों ने लोन देने के लिए निर्धारित मापदंड पूरे नहीं किए और अपनी मर्जी ने लोन जारी कर दिया। रोमिला दूबे की सिफारिश पर यह मामला विजिलेंस को सौंप दिया गया।