चंडीगढ़. अब बेशक कम्प्यूटर की वजह से इंजीनियरिंग की स्टडी पहले के मुकाबले आसान हो गई है, लेकिन चुनौतियां भी हर दिन बढ़ रही हैं। खास कर इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर्स में। पेक के इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट में 1980 में पहला कम्प्यूटर खरीदा गया था और 1991 में कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट शुरू हुआ। यह कहना है 1968 से 2000 तक पेक में टीचर रहे प्रो. वाईसी चोपड़ा।
रिटायरमेंट के बाद स्वामी देवी दयाल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, बरवाला में डायरेक्टर जनरल प्रो. चोपड़ा ने इंडियन इंजीनियरिंग-डे पर बातचीत में पेक के एचीवमेंट्स साझा किए। प्रो. चोपड़ा के मुताबिक हमारी गवर्नमेंट की पॉलिसी ठीक नहीं है। 120 कॉलेज पंजाब में हैं और इतने ही हरियाणा में। पहले सिर्फ तीन प्राइवेट कॅालेज थे। क्वालिटी ऑफ इंजीनियर्स गिर रही है। एमटेक कर चुके स्टूडेंट को बेसिक नहीं पता होते। पांच परसेंट को ही रीजनेबल एप्वाइंटमेंट मिल सकती है। इसका हल निकालना जरूरी है।
प्रो. चोपड़ा ने बताया कि जब वे इंजीनियरिंग कर रहे थे तो गुरु नानक इंजीनियरिंग कॉलेज लुधियाना, थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग पटियाला और पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) चंडीगढ़ ही इस एरिया में हुआ करता था। इलेक्ट्रिकल, मेकेनिकल और सिविल स्ट्रीम ही विकल्प थे। बीएससी के बाद तीन साल में इंजीनियरिंग होती थी। 1962 में जालंधर डीएवी कॉलेज से बाद वे इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन का कोर्स करने के लिए एमआईटी, मद्रास गए थे। उसके बाद 1965 में जीएनई लुधियाना में इलेक्ट्रिकल डिपार्टमेंट में टीचर लगे। पेक में इलेक्ट्रॉनिक्स की अलग ब्रांच शुरू हुई तो 1968 में यहां आ गए और सन् 2000 में यहीं से रिटायर हुए।
पानी से करनी पड़ती थी कम्प्यूटर की कूलिंग
प्रो. चोपड़ा ने बताया कि पहले पेक के कैंपस में 7 कोर्स और 140 स्टूडेंट होते थे। प्रॉडक्शन का पहले डिप्लोमा होता था। इलेक्ट्रॉनिक्स में 1968 में एक गर्ल स्टूडेंट्स होती थी और एक सिविल में। दोनों ही यूके चली गईं। उस टाइम इंजीनियरिंग इतनी डेवलप नहीं हुई थी। वैक्यूम ट्यूब टेक्नोलॉजी होती थी, उसमें पावर रिक्रवायरमेंट हाई होती थी। अब जितना काम एक टैबलेट कर सकता है, उससे भी कम काम एक कमरे के साइज का कम्प्यूटर करता था। हीट हो जाती और पानी से कम्प्यूटर्स की कूलिंग करनी पड़ती थी। 1968 से 69 में छोटे-छोटे इंटीग्रेटेड सर्किट आए जिन्होंने पूरी इंजीनियरिंग काे बदल दिया। इसकी मैमोरी ज्यादा थी। 1974-75 में पेक में पहला कम्प्यूटर खराब गया। सन् 1980 में इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट में पहला कम्प्यूटर खरीदा। 1991 में कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट शुरू हुआ। 1984-85 में कम्प्यूटर आए तो बेरोजगारी बढ़ने की बात कहकर लोगों ने विरोध किया था, बाद में लोगों ने महसूस किया कि इससे एम्प्लाॅयमेंट बढ़ रही थी।
इंजीनियर्स-डे: भारत में इंजीनियरिंग के पितामह मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जन्मदिन पर इंजीनियरिंग डे मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1860 मैसूर के मुदेनाहल्ली गांव में हुआ था। 1955 में इन्हें भारत रत्न दिया गया था।
आगे की स्लाइड्स में पढ़ें, ये है हमारी पेक यूनिवर्सिटी का इतिहास