चंडीगढ़. बीस साल के भरत कुमार उत्तरप्रदेश में गोरखपुर के रहने वाले हैं। मानेसर में ऑटो
मोबाइल पार्ट्स की फैक्ट्री में काम करने आए थे। वेतन 6500 रुपए। 18 जुलाई को हाइड्रोलिक मशीन पर काम करते वक्त डाई हाथ पर गिरी और दो अंगुलियां कट गईं। फैक्ट्री वालों ने ईएसआईसी अस्पताल (एंप्लाइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन) भेज दिया। नौकरी तो यूनियन के दबाव में बच गई मगर अब काम करने लायक एक ही हाथ है। भरत पर गांव में माता-पिता आैर भाई-बहन का जिम्मा है।
इसी तरह कासगंज निवासी जसवंत कुमार (26) ट्रक-जेसीबी के रिंग बनाने वाली कंपनी में मशीन पर था। एक बार रिंग गिरी और सीधे हाथ की अंगुलियां कट गईं। वह अपाहिज हो गया। नौकरी भी पक्की नहीं थी, अब भविष्य अधर में है। यहां दुर्घटनाग्रस्त कई लोगों की नौकरी स्थायी नहीं होती, वे अपाहिज होकर बाहर हो जाते हैं।
यह कहानी अकेले भरत व जसवंत की नहीं है। मानेसर गुड़गांव में ऑटो मोबाइल पार्ट्स बनाने वाली करीब एक हजार कंपनियां हैं। इनमें करीब दो लाख युवा जोखिम में काम करते हैं। गुड़गांव के ईएसआईसी अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट कायमसिंह बताते हैं रोज करीब 4-5 मजदूर किसी दुर्घटना के शिकार होकर कोई न कोई अंग गंवा बैठते हैं। महीने में लगभग 150 ऐसे लोग आते ही हैं। यही हाल पड़ोसी जिले फरीदाबाद का है।
सुरक्षा के मापदंड नहीं
सीआईटीयू (सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस) के राज्य महासचिव सतबीर बताते हैं कि जोखिम वाली कंपनियों में सुरक्षा के मापदंड नहीं हैं। अंगभंग पर मुआवजा और कानूनी पचड़ों से बचने के लिए कंपनियां लोगों को हर दिन 12 घंटे काम के लिए ट्रेनी के रूप में ही रखती हैं। अधिक उत्पादन की होड़ हादसों की बड़ी वजह है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर में मजदूर की मौत पर तो कंपनी वाले रिश्तेदारों को बुलाकर शव सौंप देते हैं। श्रम विभाग के अफसर खानापूर्ति कर जाते हैं। असिस्टेंट डायरेक्टर सेफ्टी मेजर्स हैल्थ रवींद्र मलिक ने कहा कारखानों के कायदे तय हैं। सुरक्षा उपायों की समय-समय पर जांच होती है। दुर्घटना का कारण है अप्रशिक्षित लोगों को जोखिम के काम पर लगा देना।
यातनागृह से कम नहीं ईएसआईसी अस्पताल
अस्पताल में सर्जरी के लिए 6 से 7 महीने की वेटिंग चल रही है। कैसी भी इमरजेंसी हो, पहले डिस्पेंसरी जाकर अस्पताल के लिए रेफर करवाना अनिवार्य है। इस खाना-पूर्ति में कई बार मजदूर की मौत हो जाती है।
ईएसआईसी के नाम सालाना करोड़ों जमा
कमर्चारी के वेतन से ईएसआईसी के नाम पर 150 से 350 रुपए कटते हैं। गुड़गांव-मानेसर में करीब सात लाख कर्मचारी इस दायरे में हैं। ईएसआईसी के खाते में सालाना करीब 420 करोड़ रुपए जमा होते हैं। बावजूद इसके इलाज जानलेवा है, समय पर उपचार नहीं मिलता।
30 फीसदी कर्मी स्थायी
15 हजार रुपए पगार वाले ही ईएसआईसी के दायरे में आते हैं। सीटू के अनुसार 30 फीसदी कर्मचारी ही स्थायी होते हैं। ज्यादातर को ऐसे जोखिम में कुछ भी नहीं मिलता। - जेपी मान, लेबर कमिश्नर
किस इंडस्ट्री में कितने श्रमिक
- ऑटोमोबाइल सेक्टर 2 लाख
- रियल एस्टेट सेक्टर 2 लाख
स्रोतः सीआईटीयू