हाईड्रोसीज़न टेक्नीक : 900 किमी. की स्पीड से स्लिप डिस्क का इलाज

9 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. 900 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार। रीढ़ की हड्डी खिसकने (स्लिप डिस्क) का इलाज इस स्पीड से कभी नहीं हुआ था।

अब इसी रफ्तार से रीढ़ की हड्डी के भीतर पानी फेंका जाता है, जो स्लिप डिस्क के कारण खराब हुए हिस्से को मिनटों में शरीर से बाहर निकाल देता है। 5 मिनट के इलाज के बाद मरीज 2 घंटे बाद काम पर लौट सकता है, ऐसे अहसास के साथ जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह तकनीक है हाईड्रोसीज़न ।

रीढ़ की हड्डी के इलाज में एक नया कदम मानी जा रही इस तकनीक को अमेरिका जैसे देशों में हाथों हाथ लिया गया है। करीब तीन महीने पहले लांच हुई इस तकनीक का उत्तरी भारत में पहला केस शुक्रवार को फोर्टिस में ऑपरेट होगा। इस इलाज को अंजाम देने वाले क्रिटिकल केयर और पेन मैनेजमेंट एक्सपर्ट डॉक्टर अवतार सिंह मठारू के मुताबिक यह तकनीक रीढ़ की हड्डी की सर्जरी को पूरी तरह बदलकर रख देगी।
खासकर स्लिप डिस्क और फेल्ड बैकपेन सर्जरी सिंड्रोम (एफबीएसएस) में तो यह तकनीक वरदान साबित होने जा रही है। डॉ. मठारू के मुताबिक उत्तरी भारत का पहला केस असल में अमेरिका से आया एक मरीज ही है, जो वहां स्पाइन सर्जरी करा चुका है, लेकिन उसे दर्द से राहत नहीं मिल सकी। करीब 38 वर्षीय इस एनआरआई ने अमेरिका में चार साल पहले स्लिप डिस्क की सर्जरी कराई थी। स्पाइनल सर्जरी के मामलों में करीब 40 फीसदी फेल हो जाते हैं और दर्द बना रहता है। यह केस भी उन्हीं में से एक है।
हाईड्रोसीज़न तकनीक
तकनीकी भाषा में इसे मिनिमल इन्वेसिव प्रोसीजर कहते हैं, यानी कम से कम चीरफाड़। इसमें एक कैनुला (मोटी सुई) रीढ़ की हड्डी के खराब हिस्से तक डाली जाती है। यह सुई हाइड्रोसीÊान किट का हिस्सा है। इस सुई में एक प्रेशर जेट होता है, जिससे नॉर्मल सलाइन (नमकीन पानी) प्रभावित हिस्से तक फेंका जाता है। सुई के भीतर ही एक और नीडल होती है, जो भीतर फेंके गए पानी को वापस खींच लेती है। भीतर फेंके गए पानी की स्पीड 900 किमी. घंटा होती है, जो अपने साथ खराब टिश्यू को भी साथ ही ले जाती है। और दर्द का कारण बनने वाला हिस्सा निकल जाता है। इसे वॉश अवे बैक पेन टेक्नीक भी कहा जाता है।
क्या फायदा है इस तकनीक का
मरीज को सबसे बड़ा फायदा यह है कि अस्पताल में अधिक समय के लिए भर्ती नहीं होना पड़ता। हाइड्रोसीÊान से इलाज में करीब पांच मिनट लगते हैं और उसके बाद करीब दो घंटे तक आराम। दो घंटे बाद मरीज काम पर लौट सकता है। इस तकनीक में मरीज को जनरल एनेस्थीसिया यानी बेहोश नहीं किया जाता, बल्कि जिस हिस्से में कैनुला लगाया जाता है, उसी हिस्से को सुन्न किया जाता है। इसके अलावा प्रोसीजर के दौरान हड्डी की एंडप्लेट और आसपास के हार्ड अनुलस को नुकसान नहीं पहुंचता और स्पाइनल कॉर्ड को नुकसान से बचाया जा सकता है।