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गया लाल के बेटे उदयभान ने कहा- मेरे पिता नहीं थे 'आया राम-गया राम'

7 वर्ष पहले
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चौधरी गया लाल के बेटे उदयभान।
चंड़ीगढ़.‘आया राम-गया राम’ के नाम से जो शख्स देशभर में मशहूर हुआ, उसके बेटे को इस मुहावरे से चिढ़ है।

तुर्रा ये-उन्होंने तो कभी दल बदला ही नहीं। न कभी किसी दल को धोखा दिया बल्कि धोखे ही खाए।’ यह कहना है उनके बेटे उदय भान का। वे उन चौधरी गया लाल के बेटे हैं, जो 1967 में हुए पहले चुनाव में हसनपुर सुरक्षित हलके (अब होडल) से निर्दलीय विधायक बने। तब राजनीति में निष्ठाएं बदलने का दौर था। कई सरकारें बनीं लेकिन विधायकों के पाला बदलने से चलती बनीं। चौधरी गया राम भी कई बार इधर से उधर हुए। हरियाणा के राजनीतिक संदर्भ को लेकर संसद में "आया राम-गया राम' वाक्य का इस्तेमाल हुआ और ‘गया’ शब्द गया लाल के लिए माना गया। 47 साल पुराने, लेकिन आज हॉट इस मुद्दे पर पहली बार उदय भान से सुलगते सवाल पूछे भास्कर प्रतिनिध संदीप शर्मा ने।
क्या वजह थी कि चौ. गया लाल को बार-बार दल बदलने पड़े?
मेरे पिता ने दल तो बदला ही नहीं। हां, हालात के अनुसार उनकी सपोर्ट जरूर बदली। 1967 में भगवत दयाल शर्मा की वजह से पिता जी को कांग्रेस का टिकट नहीं मिला। वो आजाद ही जीते। इसी बीच कांग्रेस के चौधरी चांद राम पिता जी के पास आए और कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी उन्हें सीएम बनाना चाहती हैं। पिता जी ने कांग्रेस को सपोर्ट कर दिया। लेकिन जब विधायक दल की बैठक हुई तो शर्मा का नाम सीएम के लिए बढ़ा दिया गया। पिता जी ने कांग्रेस से समर्थन वापस ले लिया। शर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार कुछ दिन ही चली। फिर राव बीरेंद्र सिंह (वर्तमान में सांसद राव इंद्रजीत के पिता) ने हरियाणा विशाल पार्टी बनाकर सरकार बना ली। पिता जी ने उन्हें समर्थन दे दिया। राव सरकार 224 दिन ही चली और कई विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया। फिर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

तो आपके पिता किस दल की विचारधारा से प्रभावित थे?
हमारा परिवार शुरू से ही कांग्रेसी रहा है। मेरे दादा धर्मसिंह 1928 से 1942 तक होडल नगर पालिका के प्रधान रहे। उनके बाद मेरे पिता प्रधान रहे। अब मैं भी कांग्रेस में हूं। 2005 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बना लेकिन 2009 में हार गया। इस बार भी चुनाव लडूंगा।

फिर आपके पिता ने हर बार अलग दल से चुनाव क्यों लड़ा। उन्होंने कांग्रेस से तो चुनाव लड़ा ही नहीं?
उन्हें हर बार धोखा मिला। 1972 और 1982 में बूटा सिंह ने पिता जी का टिकट कटवा दिया। पहले बिहारी लाल को टिकट दिलाया और दूसरी बार गिरिराज किशोर को। चौ. चांद राम में निष्ठा थी, इसलिए उनके साथ जनता पार्टी में गए। 1977 में इसी पार्टी से लड़कर चुनाव जीता। बाद में भजन लाल कई विधायक लेकर दल बदल गए। 1982 में कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो पिता जी ने आजाद चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। उसके बाद वे चौधरी चरण सिंह के साथ लोकदल में आ गए।
आगे की स्लाइ्स में पढ़ें, खैर, आप मानते हैं कि आपके पिता ने कभी दल नहीं बदला, तो उनके नाम पर मुहावरा कैसे बन गया?