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इस महिला ने दूसरों की सेवा के लिए त्यागा संतान सुख, 6000 लड़कियों की जिंदगी सुधारी

8 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. इंसान अपनी चॉइस के हिसाब से मर नहीं सकता, लेकिन जिंदगी तो अपनी चॉइस के मुताबिक जीने का अधिकार रखता है। मैंने यह इरादा उस वक्त किया था जब 1964 में हार्ट सर्जरी के लिए मैं डेढ़ साल तक एडमिट रही।
नई जिंदगी मिलने के बाद जाना जीवन का मकसद
डॉक्टरों ने मेरे जिंदा रहने की उम्मीद छोड़ दी लेकिन जिस रोज पीजीआई से ठीक होकर बाहर निकली तो जीवन का मकसद जान चुकी थी। यह बात जहन में थी कि मुझे जो नई जिंदगी मिली है, उसका शुक्रिया अदा कैसे करना है। 20 साल लग गए ये जानने में कि गरीब या दीन-दुखियों की मदद के रास्ते पर कैसे चलना है। लेकिन 1985 में क्रिड के रिसर्च फैलो बनने के बाद मैंने फैसला किया कि अब समाज के लिए कुछ करने का समय आ चुका है। ये कहना है हाल ही में पदमश्री अवाॅर्ड पाने वाली डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन का। डॉ. पलटा का पूरा परिवार एक भाई और दो बहनें सेक्टर-27 में रहते हैं।

अपना बच्चा न करने का फैसला लिया
डॉ. जनक पलटा ने कहा कि रिसर्च के सिलसिले में कई बार इंदौर आ चुकी थी तो इंदौर के आसपास की आदिवासी लड़कियों की जिंदगी बनाने के लिए चंडीगढ़ छोड़ दिया। फैसला किया कि अपनी कोई औलाद नहीं होगी, क्योंकि मैं जिन बच्चियों की मदद के लिए निकली थी, उन बच्चियों के लिए मैं राइवल नहीं पैदा करना चाहती थी।
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