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इंसान अपनी चॉइस के हिसाब से मर नहीं सकता, लेकिन जिंदगी तो अपनी चॉइस के मुताबिक जीने का अधिकार रखता है।

अधीर रोहाल

Jan 31, 2015, 02:14 AM IST
डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
चंडीगढ़. इंसान अपनी चॉइस के हिसाब से मर नहीं सकता, लेकिन जिंदगी तो अपनी चॉइस के मुताबिक जीने का अधिकार रखता है। मैंने यह इरादा उस वक्त किया था जब 1964 में हार्ट सर्जरी के लिए मैं डेढ़ साल तक एडमिट रही।
नई जिंदगी मिलने के बाद जाना जीवन का मकसद
डॉक्टरों ने मेरे जिंदा रहने की उम्मीद छोड़ दी लेकिन जिस रोज पीजीआई से ठीक होकर बाहर निकली तो जीवन का मकसद जान चुकी थी। यह बात जहन में थी कि मुझे जो नई जिंदगी मिली है, उसका शुक्रिया अदा कैसे करना है। 20 साल लग गए ये जानने में कि गरीब या दीन-दुखियों की मदद के रास्ते पर कैसे चलना है। लेकिन 1985 में क्रिड के रिसर्च फैलो बनने के बाद मैंने फैसला किया कि अब समाज के लिए कुछ करने का समय आ चुका है। ये कहना है हाल ही में पदमश्री अवाॅर्ड पाने वाली डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन का। डॉ. पलटा का पूरा परिवार एक भाई और दो बहनें सेक्टर-27 में रहते हैं।

अपना बच्चा न करने का फैसला लिया
डॉ. जनक पलटा ने कहा कि रिसर्च के सिलसिले में कई बार इंदौर आ चुकी थी तो इंदौर के आसपास की आदिवासी लड़कियों की जिंदगी बनाने के लिए चंडीगढ़ छोड़ दिया। फैसला किया कि अपनी कोई औलाद नहीं होगी, क्योंकि मैं जिन बच्चियों की मदद के लिए निकली थी, उन बच्चियों के लिए मैं राइवल नहीं पैदा करना चाहती थी।
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डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
सनावदिया आकर बदली जिंदगी
डॉ. मेगिलिगन बताती हैं कि इंदौर आकर भी ये पता नहीं था कि काम कैसे शुरू करना है। एक रोज इंदौर के नजदीक सनावदिया में एक महिला से पूछा कि ये बंजर जमीन किसकी है। उन्होंने बताया कि ये जमीन हमारी ही है। उन्होंने मेरे पूछने का कारण जाना तो छह एकड़ जमीन मुझे आदिवासी लड़कियों की जिंदगी बनाने के लिए दे दी। बरली डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट फॉर रूरल वीमन शुरू किया। कोशिश थी उन आदिवासी लड़कियों की जिंदगी बदल सकूं जिनकी शादी 15 साल से पहले हो जाती है। नेशनल स्पिरिचुअल बहाई आर्गनाइजेशन मदद के लिए आगे आई। कोशिशें रंग लाने लगीं। अब तक छह हजार ऐसी बच्चियों की जिंदगी सुधार चुकी हूं। सनावदिया के आसपास के गांवों में सोलर लाइट के इस्तेमाल पर जोर दिया। 
 
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सेमिनार में भाग लेती डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन सेमिनार में भाग लेती डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
चंडीगढ़ में ही हुई पूरी स्टडी
डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन की स्कूली पढ़ाई सेक्टर-21 के गवर्नमेंट स्कूल में हुई और ग्रेजुएशन पीयू से हुई। यहीं से ही एमए इंग्लिश और पॉलिटिकल साइंस पूरी की। पीयू से ही एमफिल करने से पहले 1968 में प्रोविडेंट फंड ऑफिस में नौकरी की। आठ साल की नौकरी करने के बाद पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट में ट्रांसलेटर की नौकरी की। एमफिल पूरी हुई तो एक साल जगराओं के कॉलेज में लेक्चरर बनीं। लेकिन 1981 में क्रिड आकर रिसर्च फैलो के तौर पर काम शुरू कर दिया। देश के कई हिस्सों में रिसर्च प्रोजेक्ट पर जाना हुआ तो पता चला कि दुखी और अनपढ़ लोगों की मदद रिसर्च के जरिए नहीं हो सकती। ऐसे में फैसला किया कि इंदौर में आदिवासी लड़कियों के लिए काम करना है।
 
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डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
पति के साथ शुरू किया कार्य 
इन्हीं के साथ इंदौर के पास सनावदिया में अपने पति के साथ काम शुरू किया। 2007 में रोड एक्सीडेंट में पति की मौत हो गई और मुझे भी गंभीर चोटें आईं। लेकिन जरूरतमंद बच्चों की दुआओं ने मुझे बचा लिया।
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डॉ. जनक पलटा मैग्लिगनडॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
डॉ. जनक पलटा मैग्लिगनडॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
सेमिनार में भाग लेती डॉ. जनक पलटा मैग्लिगनसेमिनार में भाग लेती डॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
डॉ. जनक पलटा मैग्लिगनडॉ. जनक पलटा मैग्लिगन
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