चंडीगढ़। सेक्टर-25 के श्मशानघाट से अपनी पढ़ाई की शुरुआत करने वाले कई बच्चे आज एमएससी, एफएफए, बी टेक, फिजियोथैरेपी जैसे कोर्स में एडमिशन ले चुके हैं। कुछ को एजी पंजाब, बीएसएफ में सरकारी नौकरी मिल चुकी है। ये बच्चे ऐसे परिवारों से हैं जहां रोटी की जद्दोजहद हर रोज कूड़ा बीनने, लोगों के घरों में काम करने या सफाई करने जैसे काम से शुरू होती है। इन बच्चों का बचपन शहर की कॉलोनियों में बीत रहा था, लेकिन थियेटर एज ने ऐसे बच्चों की जिंदगी संवारने की पहल की।
इसकी सबसे पहले शुरुआत 22 साल पहले जुल्फिकार खान ने श्मशानघाट से की थी। जुल्फिकार खान बताते हैं कि 1992 में एक स्कूल की वर्कशॉप में नाटक की रिहर्सल में 7 फीट के घड़े के अंदर एक बच्चा संवाद बोल रहा था। अचानक उस बच्चे के बॉडीगार्ड ने उसको बाहर निकालने को कहा ताकि उसे कुछ न हो। बाद में रास्ते में मैंने कचरे के डस्टबीन में दो बच्चों को कूड़ा बीनते देखा। इन बच्चों को देखते ही मैंने फैसला कर लिया कि अब ऐसे गरीब बच्चों के लिए ही थियेटर करना है। इसके बाद मैंने सेक्टर-25 की कॉलोनी के बच्चों के साथ जगह न होने पर श्मशानघाट में ही नाटक करना शुरू कर दिया।
8 साल श्मशानघाट ही था ठिकाना
जुल्फिकार खान बताते हैं कि पहला नाटक होने के बाद आठ साल श्मशानघाट पर ही रिहर्सल करवाकर नाटक तैयार किए। एक रोज बच्चे पेंटिंग्स बना रहे थे तो श्मशानघाट संस्कार के लिए आए आर्ट्स कॉलेज के प्रिंसिपल सरदार प्रेम सिंह ने सलाह दी कि बच्चों की पेंटिंग्स तैयार करवाओ मैं एग्जीबिशन लगवाऊंगा। एग्जीबिशन में एडवाइजर नीरू नंदा आई। नीरू ने उनको सेक्टर-25 के स्कूल में पेड़ के नीचे जगह दे दी। इससे उन्हें स्कूल का माहौल मिल गया।
ऐसे हुई बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत
जुल्फिकार खान बताते हैं कि बच्चे नाटक के डायलॉग पढ़ नहीं पाते थे इसलिए रटने पड़ते थे। एक रोज मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि बच्चों को स्कूल भेजते हैं। पहले चार बच्चे स्कूल भेजे जिनमें से तीन पास हो गए। इसके बाद पढ़ाई के खर्चे के लिए एक जर्नलिस्ट के सुझाव पर खबर छपवाई कि आप अगर ऐसे बच्चों की मदद करना चाहते हो तो अखबारों की रद्दी दो। रद्दी अाने लगी और पढ़ाई शुरू हो गई।
रहनुमा बनकर आए मददगार
बच्चे बढ़ते गए तो ज्यादा स्पेस की जरूरत थी। मैंने डीपीआई एसके सेतिया को ये मुश्किल बताई तो उन्होंने मुझे इसी स्कूल में कमरा भी दे दिया। एसके सेतिया ने मेरी हर मुश्किल में मदद की। बाहर से आकर आईएएस अफसर एसपी सिंह, एसई वीके अरोड़ा,पीयू के रिसर्च स्कॉलर जैसे कई लोग आज भी बच्चों को पढ़ाने आते हैं। सेक्टर-25 के शंभू जैसे कई बच्चों की एजी ऑफिस या दूसरे दफ्तरों में नौकरी लग गई।
बस रद्दी की चाहिए मदद
जुल्फिकार खान कहते हैं कि मुझे लोगों ने बहुत मदद दी, लेकिन अब बच्चे हायर एजुकेशन ले रहे हैं। खर्च बढ़ गए हैं। ऐसे में लोगों से ज्यादा से ज्यादा सिर्फ अखबारों की रद्दी डोनेट करने की मदद चाहिए। जुल्फिकार कहते हैं कि रद्दी डोनेट करने के लिए 98151-45453 पर संपर्क कर सकते हैं।
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