चंडीगढ़. कभी भारतीय झंडे के लिए जान लड़ाने वाली पंजाब की रेसलर रूपिंदर कौर अब ऑस्ट्रेलियाई के लिए ओलंपिक खेलने का सपना संजो चुकी है। इसे किस्मत ही कहेंगे कि नेशनल चैंपियन रही और भारत के लिए जूनियर इंटरनेशनल
रेसलिंग टूर्नामेंट में गोल्ड जीत चुकी हरिके पत्तन की रूपिंदर ने 2014 ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलियाई झंडे तले खेला। जूडो से रेसलर बनीं रूपिंदर के भारत से ऑस्ट्रेलिया जाकर और रेसलिंग करना किसी चुनौती से कम नहीं था। 2007 में वह स्टडी के लिए मेलबर्न आई थी और शादी तय होने के बाद उन्हें यहीं सेटल होना पड़ा। लेकिन रूपिंदर ने रेसलिंग करना नहीं छोड़ा और 2008 में मेलबर्न में ही ट्रेनिंग करनी शुरू की। मेहनत रंग लाई और 2008 से 2013 तक रूपिंदर कौर ने 48 किलोग्राम फ्री स्टाइल में सबको पछाड़ते हुए लगातार नेशनल चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया जिसमें ऑस्ट्रेलिया कप भी शामिल हैं।
स्पोर्ट्स के कारण मिली सिटीजनशिप
रूपिंदर इतने सालों से यहां रह रही थी लेकिन किसी इंटरनेशनल इवेंट में हिस्सा नहीं सकी। इसका कारण था कि उनके पास ऑस्ट्रेलिया की सिटीजनशिप नहीं थी। 2014 कॉमनवेल्थ खेलना उनका टारगेट था और इसी लिए उनके कोचेज ने सरकार से रिक्वेस्ट की और उनके 5 नेशनल गोल्ड का हवाला दिया। इसी आधार पर रूपिंदर को नागरिकता मिल गई और कॉमनवेल्थ में रूपिंदर ने हिस्सा भी लिया।
पहले कुक अब मशीन ऑपरेटर
चाहे आप इंटरनेशनल प्लेयर्स हो लेकिन आप को नौकरी कर अपनी ट्रेनिंग और डाइट का खर्चा खुद उठाना होता है। रूपिंदर ने बताया कि शुरूआती दिनों में उन्होंने कुक की जॉब की और अब वह मेलबर्न की लेबर पॉवर कंपनी में मशीन ऑपरेटर हैं। हर महीने उनका 1500 डॉलर ट्रेनिंग, डाइट और सप्लीमेंट पर खर्च हो जाता है। लेकिन रूपिंदर का सारा ध्यान 2016 के ओलंपिक पर लगा है और इसके लिए वह ट्रायल्स का इंतजार कर रही है।