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पढ़ाई के लिए दूसरों के घरों में पोछा लगाया, पैदल चली, सब्र टूटा तो कर ली खुदकुशी

7 वर्ष पहले
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टाहलिया (मानसा). बस का किराया न होने पर फांसी लगाकर फंदा लगाने वाली गांव अहमदपुर निवासी डाइट की स्टूडेंट करमजीत कौर मुफलिसी में गुजारा कर रही थी। उसके परिवार की आर्थिक हालत इतनी ज्यादा खराब थी कि उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए लोगों के घरों में झाडू पोछा करना पड़ता था। वहीं हर रोज ऑटो का किराया बचाने के लिए करमजीत चार किलोमीटर का सफर पैदल तय करती थी।

करमजीत का सपना था कि वह आगे चलकर अपने परिवार को सभी खुशियां दे। लेकिन परिवार की तंगहाली ने करमजीत को इतना झकझोरा की उसने सोमवार को सुसाइड कर लिया। करमजीत कौर पढ़ाई में भी बहुत होशियार थी। वहीं करमजीत के पिता ने भी बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज ले रखा था।
बारहवीं में हासिल किए थे 75 फीसदी नंबर
करमजीत कौर पढ़ने में बहुत होशियार थी। करमजीत को बारहवीं में 75 फीसदी हासिल करने पर एससी कोटे के तहत संगरूर की डाइट में इस साल के सेशन का दाखिला मिला था। करमजीत कौर की पढ़ाई दो साल की थी। लेकिन वहां रोज आने जाने पर होने वाले खर्च को देखते संगरूर डाइट के प्रबंधकों ने करमजीत को बुढलाडा में शिफ्ट करवा दिया। करमजीत गांव से बुढलाडा के लिए बस लेती थी, जिसके बाद वह चार किलोमीटर का सफर पैदल तय करती थी। करमजीत कौर को इस बात का एहसास हो गया था कि ईटीटी पास करने के बाद उसको भी बाकी स्टूडेंट्स की तरह बेरोजगार घूमना पड़ेगा। इसलिए वह जीएनएम का कोर्स कर लेना चाहती थी। लेकिन कुदरत को यह मंजूर नहीं था।
बेटी के इस आत्मघाती कदम से पूरा परिवार सदमें में
सोमवार को होनहार बेटी के सुसाइड सेे पीड़ित परिवार टूटने लगा है। दिहाड़ी कर अपने परिवार का गुजारा करने वाले गांव टाहलिया के दलित मजदूर बंत सिंह के सामने अब अपने बच्चों के अधूरे भविष्य की चिंता सता रही है। जिनके लिए उसने मेहनत से पाई-पाई जोड़कर शिक्षा दिलानी थी। दूसरी तरफ बंत सिंह की पत्नी जसवीर कौर भी लंबे समय से टीबी की मरीज है। जो बीमारी के चलते उसके साथ काम में हाथ नहीं बटा सकती। वहीं पूरा परिवार गुर सिख होने के साथ साथ नशा रहित भी है। लेकिन अब परमात्मा को यही मंजूर था। बंत सिंह के चार बच्चे हैं। जिनमें दो बेटे व दो बेटियां है। इनमें से करमजीत कौर सबसे बड़ी थी।
तंगहाली के कारण भाई-बहन की पहले ही छूट गई पढ़ाई
घर में मौजूद एक भाई व बहन ने गरीबी के चलते स्कूल छोड़ दिया। भाई मनजिंदर सिंह प्लस टू करने के बाद मानसा कॉलेज में दाखिला लेना चाहता था, लेकिन दाखिला फीस अधिक होने के चलते उसे पढ़ाई से ही त्याग लेना पड़ा। जिसके बाद वह अपने पिता के साथ काम में हाथ बंटाने लगा। वहीं छोटी बहन राजविंदर कौर नौंवी कक्षा में किताबें पूरी होने के चलते फेल हो गई। जिसके बाद उसने भी दोबारा स्कूल की सूरत नहीं देखी। जबकि सबसे छोटा भाई गुरविंदर सिंह गांव के सरकारी स्कूल में दसवीं कक्षा कर रहा है।
कर्ज सिर पर होने के चलते गहने भी हुए गिरवी
बंत सिंह ने अपने बच्चों के भविष्य को रोशन करने के लिए शिक्षा की तालीम दिलाई थी। इसके लिए उसने भाई से 15 हजार रुपये उधार लिए। लेकिन शिक्षा की बढ़ रही कीमत के आगे उसकी एक न चली। इतना ही नहीं अपने पास जो जेवर थे। वही भी गांव के किसी व्यक्ति के पास 25 हजार में गिरवी पड़े हैं।
पांच साल से आचार से खा रहे थे खाना
बंत सिंह के परिवार पर गरीबी का मंजर इस कदर था कि परिवार ने पिछले पांच साल से घर में सब्जी नहीं चखी थी। करमजीत की मौसी उन्हें अचार भेजती थी। यहीं उनके लिए सब्जी थी। एक कमरे में पूरा परिवार रहता है।
कभी किसी से नहीं मांगी कोई मदद
डाइट बुढलाडा के प्रिंसिपल मुकेश कुमार ने कहा, करमजीत कौर ने कभी अपने परिवार की गरीबी के बारे में नहीं बताया। अगर वह बताती तो उसकी मदद की जाती। उन्हें भी अपनी काबिल स्टूडेंट के जाने का गम है।