चंडीगढ़. न जेब में रुपए थे, न
मोबाइल फोन और न पांव में जूते। अंजान शहर था और 107 किलोमीटर दूर होटल तक पहुंचने के लिए अपनी कोई गाड़ी भी नहीं थी। चेन्नई टूर के दौरान प्रशासन व नगर निगम के दो अफसरों को कुछ ऐसे ही हालात का सामान करना पड़ा। ये अफसर 17 काउंसलर्स, उनके परिवार के 12 सदस्यों और चार अन्य अफसरों के साथ चेन्नई से तिरुपति गए थे। मंदिर में पर्स तक ले जाने की मनाही है, इसलिए सबने अपना सारा सामान टैक्सियों में रखा था। वापसी में जॉइंट सेक्रेटरी लोकल बॉडीज एमएम सभ्रवाल और लॉ ऑफिसर अशोक कुमार गौतम पीछे रह गए। उनका इंतजार किए बगैर ही उनके सहयोगी अफसर चेन्नई लौट गए। उनके लिए कोई गाड़ी नहीं छोड़ी। बिना पैसों, बिना जूतों के दोनों अफसर जैसे-तैसे बस और टैक्सी से चेन्नई पहुंचे। गुस्साए सभ्रवाल की जॉइंट कमिश्नर राजीव गुप्ता से तीखी बहस हुई, फिर काउंसलर्स ने उन्हें शांत करवाया।
निगम के 19 काउंसलर, छह ऑफिसर 31 अगस्त को टूर पर चेन्नई पहुंचे थे। इनमें से आठ काउंसलर्स के परिवार के 12 सदस्य भी साथ थे। काउंसलर्स और अफसर चेन्नई में अम्मा कैंटीन देखने अगले दिन तिरुपति गए।
गाड़ी में रह गया पर्स, जूते
35 लोग नौ गाड़ियों से 107 किलोमीटर दूर तिरुपति मंदिर गए। सभी ने मंदिर में चढ़ाने व प्रसाद खरीदने के लिए कुछ पैसे जेब में रख लिए। बाकी बैग, पर्स, जूते, बेल्ट जैसा सारा सामान गाड़ियों में छोड़ दिया। पूजा करने के बाद अशोक कुमार गौतम और एमएम सभ्रवाल बाहर पार्किंग में पहुंचे तो देखा कि उनकी गाड़ियां थी ही नहीं। बाकी अफसर व काउंसलर भी नहीं मिले। मोबाइल फोन भी गाड़ियों के साथ चले गए थे इसलिए किसी को कॉल भी नहीं पाए, किसी का नंबर भी याद नहीं था। वह नंगे पैर और बगैर पैसों के इधर-उधर भटकते रहे। दोनों ने वहां कई लोगों को अपनी व्यथा बताकर मदद मांगी। बताया कि वे अफसर हैं। लोगों से पैसे मांगकर वे बस व टैक्सी से किसी तरह चेन्नई पहुंच पाए।