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डाउनलोड करेंचंडीगढ़। देश में महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण दिए जाने का मकसद आज किस स्वरूप में है। इसकी स्टडी में चौंकाने वाली तस्वीर उभर कर आई है। पंजाब यूनिवर्सिटी की रिसर्च स्कॉलर मधु बाला के 'पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन ऑफ वुमन इन पंचायत' पर किए रिसर्च के नतीजों के मुताबिक पंचायत स्तर पर आज भी महिला जनप्रतिनिधि पुरुषों की छाया से बाहर नहीं आ पाई हैं।
गुरदासपुर जिले की 210 पंचायत मेंबर्स के पर्सनल इंटरव्यू, साइंटिफिक क्वेश्चनायर, जाति-धर्म, पॉलिटिकल बैकग्राउंड, पुरुषों के मुकाबले परफॉर्मेंस के आधार पर यह स्टडी की गई है। मधु बाला कहती हैं - संविधान के 73 वें संशोधन के बाद महिलाओं को पंचायतों में भागीदारी तो मिली,
लेकिन अब भी ग्रामीण उन्हें नेता के तौर पर नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं। विपरीत हालात के बावजूद महिला सरपंच और पंच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब हैं। मगर फंड की कमी, वाहन न चला पाने के कारण कम मोबिलिटी, अशिक्षा और घरेलू जिम्मेदारियों को महिलाएं पांव की बेडिय़ां मानती हैं। मधु ने यह रिसर्च प्रो. सुरिंदर कलेर शुक्ला की गाइडेंस में की है।
ऐसे मिले हालात
एक विवाद में निपटारे के लिए थाने गई महिला पंच को यह कहते हुए लौटा दिया गया कि वह अपने पति या किसी दूसरे पुरुष सदस्य को भेजे। उससे इस संबंध में क्या बात की जा सकती है। महिला सरपंच की जगह उसके देवर ने रिसर्चर मधु के सवालों के जवाब दिए। 25 साल तक सरपंच रह चुके देवर के मुताबिक महिला सीट होने से मजबूरी थी, अब वह ही काम संभाल रहे हैं।१६ फीसदी महिलाएं खराब माहौल के कारण नहीं लड़ेंगी चुनाव पंचायतों में जनरल कैटेगरी की महिलाएं ज्यादा एक्टिव हैं। मध्यम और उच्च दर्जे की भागीदारी इन्हीं में ज्यादा है।
16 फीसदी महिलाओं के मुताबिक सोशल एन्वायर्नमेंट ठीक न होने के कारण वह दोबारा इलेक्शन नहीं लड़ेंगी। फैसलों में सरपंच के हावी रहने और पॉलिटिकल दखल की शिकायत मिली। ज्यादातर महिलाएं पति, ससुर या अन्य रिश्तेदार की वजह से राजनीति में आईं। पति अपनी पत्नी के नाम पर राजनीति चला रहे हैं। पुरुष इस स्कीम का स्वागत करते हैं। कई महिला सरपंच और पंच ब्यूरोक्रेसी और ऑफिशियल्स से निपटने के लिए जूझ रही हैं। पार्टीज भी कई जगह उनका विरोध करती हैं।
सुधार के लिए स्कॉलर की सिफारिशें स्किल डेवलपमेंट के लिए महिलाओं को ट्रेनिंग मिले। पॉलिटिकल पार्टीज मानसिकता बदले, परिवारवाद के बजाय आम महिलाओं को भी मौका दें। महिलाएं पंचायतों का काम ठीक से कर पाए, इसलिए जरूरी फंड जुटाए जाएं।उनमें कॉन्फिडेंस लाएं, ताकि वह हर फैसले के लिए पुरुषों का मुंह न देखें। बेहतर काम करने वाली पंचायत मेंबर्स को और अधिक मौका मिले।
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