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इंदिरा से अलग हैं सोनिया, मिलने के लिए लगानी पड़ती है सिफारिश

7 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. मार्क टली ने भारत और उसकी राजनीति को करीब से देखा है। बीबीसी में काम करते हुए वे ऑपरेशन ब्लू स्टार से लेकर इंदिरा गांधी हत्याकांड और हर ऐसे घटनाक्रम के गवाह रहे। अपनी किताब इंडियाज अनएंडिंग जर्नी के बारे में चर्चा के लिए सर मार्क टली, साहित्य अकादमी के बुलावे पर चंडीगढ़ आए थे। इसी दौरान रविवार को उनसे हुई यह बातचीत ।

आपने भारत में कई चुनाव देखे और कवर किए? पिछला चुनाव किस तरह अलग था? मार्क कहते हैं- यह चुनाव सबसे अलग था। भाजपा के कैम्पेन जैसा प्रोफेशनलिज्म मैंने इससे पहले नहीं देखा था। उनकी जीत अविश्वसनीय थी। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला था कांग्रेस का इतनी बुरी तरह हार जाना। ये ऐसा चुनाव था जिसमें जीतने और हारने वाले, दोनों की उम्मीद से कहीं आगे वाले नतीजे आए। कांग्रेस की हार के लिए आपकी नजर में कौन जिम्मेदार है? उन्होंने बताया-इस बारे में भाजपा नेता अडवाणी की ही बात को मैं दोहराऊंगा कि पिछली सरकार का नॉन कम्युनिकेटिव होना। अगर आप काम कर रहे हैं तो उसके बारे में बात करना भी तो जरूरी है, यह उन्होंने नहीं किया।

सोनिया गांधी के बारे में क्या कहेंगे? क्या वे भी नॉन कम्युनिकेटिव हैं? मार्क कहते हैं-पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से बाजपेयी तक सब लोगों से मिलने का एक तरीका होता था। लेकिन सोनिया गांधी से मिलने के लिए कोई तरीका फॉलो नहीं किया जा सकता। उनसे मिलने के लिए सिफारिश की जरूरत होती है। तो क्या यह माना जाए कि अपने नॉन कम्युनिकेटिव या रिजर्व होने की कीमत अदा कर रही है कांग्रेस लीडरशिप? मार्क बोले-मैं यह नहीं कहूंगा।
हिंदी बोलने में गर्व महसूस होना चाहिए
मार्क टली मानते हैं कि ब्रिटेन में जन्म होने के बावजूद उन पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव है। यही वजह है कि वे हिंदी बोलते हैं। क्या भारतीयों को हिंदी दिवस मनाना चाहिए? वे कहते हैं-जरूर मनाना चाहिए लेकिन हिंदी बोलने में गर्व भी महसूस करना चाहिए। मेरा मानना है कि भारत में रहकर हिंदी सीखना आसान नहीं। यहां किसी से हिंदी में सवाल पूछ भी लिया तो वो जवाब अंग्रेजी में ही देने की कोशिश करता है। अगर बात कॉलोनियल हैंगओवर की है तो इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाएं अच्छी तरह बोल-पढ़ लेते हैं। भारत जैसे देश में तो सिर्फ हिंदी ही क्यों अन्य रीजनल भाषाएं भी सीखनी चाहिएं। हिंदी की वकालत करते हुए वे खुद कितने भारतीय हैं? जवाब था-मैं दरअसल दो संस्कृतियों से खुद को जुड़ा पाता हूं, भारतीय और ब्रिटिश।