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भारतवंशी थे प्रेसली, पिकासो और चार्ली चैपलिन

5 वर्ष पहले
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संगीतकारएल्विस प्रेसली, चित्रकार पाब्लो पिकासो, कॉमेडियन चार्ली चैपलिन में एक समानता है। ये सभी रोमा समुदाय के हैं जिसकी जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं। दिल्ली के आजाद भवन में शुक्रवार से भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) का तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रोमा कांफ्रेंस एंड कल्चरल फेस्टिवल शुरू हुआ है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने रोमाओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘भारत आपका है और आप भारत के हैं।’

दुनिया के 30 देशों में रोमा समुदाय लोगों की संख्या करीब 2 करोड़ है। इस सम्मेलन में 12 देशों के 33 रोमा विशेषज्ञ, शोधार्थी और कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। इनका मानना है कि ये उन बीस हजार भारतीयों के वंशज हैं जिन्हें दो हजार वर्ष पहले सिंकदर अपने साथ यूरोप ले गया था। इनमें लोहे के हथियार बनाने वाले कारीगर, शिल्पकार और संगीतज्ञ थे। ज्यादातर रोमा रूस, स्लोवाकिया, हंगरी, सर्बिया, स्पेन और फ्रांस में बसे हैं। जबकि कुछ रोमानिया, बुल्गारिया और तुर्की में हैं। इनमें भारत की डोम, बंजारा, गुर्जर, सांसी, चौहान, सिकलीगर, डागर आदि जातियों के लोग हैं।

रोमा समुदाय के लोग विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। इन्हें सर्वोत्तम नर्तक और संगीतकार के रूप में जाना जाता है। फिरदौसी द्वारा लिखित शाहनामा के मुताबिक पांचवीं शताब्दी में ईरान के राजा बैराम गुर के निवेदन पर एक भारतीय राजा ने वहां राष्ट्रीय उत्सव के लिए 20 हजार संगीतकार भेेजे थे। आज उन्हीं के वंशज सारे यूरोप में प्रसिद्ध कलाकार हैं। अपनी अस्मिता पर गर्व के कारण रोमा लोगों ने कठिनतम परिस्थितियों में से गुजरते हुए भी अपनी परंपराओं को जीवित बनाए रखा।

आईसीसीआर के अध्यक्ष लोकेश चंद्र ने कहा कि जिस तरह सिल्क रूट था, उसी तरह एक स्टील रूट भी था जो भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अरब होते हुए यूरोप तक जाता है। रोमा इसी रास्ते से यूरोप तक पहुंचे। ग्रीक विद्वान पसपति का उल्लेख करते हुए कहा कि ये लोग यूरोप में क्रास को देखकर त्रिशूल बोला करते थे। बाद में पता चला कि ये शंकर के त्रिशूल की बात कर रहे हैं। इसी तरह फ्रांसीसी शोधकर्ता डी वानिया का जिक्र करते हुए चंद्र ने कहा कि भारत ने चाहे उन्हें भुला दिया है लेकिन वे भारत को नहीं भूले हैं। वे खुद को रामा नो छावा अर्थात राम के बच्चे कहते हैं।

नई दिल्ली में रोमा समुदाय के लोगों से मिलतीं सुषमा स्वराज

आईसीसीआर के अध्यक्ष लोकेश चंद्र ने कहा कि उनकी मूल शब्दावली हिंदी की शब्दावली से काफी मेल खाती है। जैसे आग को वे याग कहते हैं, ऋषि को रोसाई, नाक-कान जैसे शब्द वे इस्तेमाल करते हैं। गिनती में भी वे एक के लिए येक, दो के लिए दुई, तीन के लिए त्रिन, पांच को पांच और दस के लिए दिस शब्द का प्रयोग करते हैं।

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