कल्पेश याग्निक का कॉलम...
‘वामपंथी : जिनके पास आदर्शों के नाम पर क्रूर तानाशाहों जैसे वो नेता हैं - जिन्हें तानाशाही करने नहीं मिली। तो जुमले, जनवादी चला दिए। कि ‘सर्वहारा की तानाशाही।’ जबकि इच्छा भीतर यही रही-‘पावर ग्रोज़ आउट ऑफ द बैरल ऑफ अ गन।’
‘दक्षिणपंथी : वो प्रतिक्रियावादी ताकतें जिन्हें लगता है कि संस्कृति का पूरा बोझ उन पर है। इस जिम्मेदारी के नाम पर वे सभी को डरा कर रखना चाहती हैं।’
- परिभाषाएं, जो अभी तक प्रचलित नहीं हैं।
आज का यह कॉलम उन सभी बुद्धिजीवियों को विचलित कर सकता है - जो सभी के जीवन को एक तयशुदा विचारधारा के बंधन से बांधकर देखते हैं।
इससे बड़ा धक्का क्या हो सकता है कि देशद्रोहियों को देशद्रोही कहने के लिए साहस, तर्क और समर्थन जुटाना पड़े?
और धिक्कार है उन पर -जो राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ से जोड़कर बढ़ावा दे रहे हैं।
और सावधान उन अतिवादियों से भी रहना होगा -जो ‘भारत की बर्बादी’ के इस बुद्धिहीन नारे के विरोध में चीखकर, एक नया डर पैदा करना चाह रहे हैं।
दोनों को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी -जेएनयू- से उठे एक बवंडर में स्वार्थ के बड़े अवसर दिख रहे हैं।
इन्हें, इन दोनों तरह के नेतृत्व को ध्यान से देखना होगा। दोनों तरह की भीड़ को गहराई से जांचना होगा।
‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का कवच चाहने वाले वामपंथी हैं। लेफ्ट।
मुट्ठीभर देशद्रोहियों के कारण जेएनयू जैसे उच्च स्तरीय संस्थान पर बहस छेड़ना आपत्तिजनक है। जेएनयू, वामपंथी रुझान वाला केंद्रीय विश्वविद्यालय है -किन्तु जिस तरह वामपंथी नेता जेएनयू पर बोल रहे हैं -वो तो ऐसा लग रहा है मानो जेएनयू उनकी पार्टी की सरकार वाला कोई राज्य हो! बजाए इसके कि वहां आतंकी के समर्थन और महिमामंडन में क्या-कैसे हुआ, यह जांचने के, वामपंथी नेता जेएनयू की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और योगदान पर भाषण दे रहे हैं। जैसे अपनी सरकार के अच्छे कार्यक्रमों का ब्योरा दे रहे हों!
जेएनयू का छात्रसंघ चूंकि लेफ्ट-समर्थित है, इसलिए देशद्रोह के मुकदमे पर उनका बौखलाना स्वाभाविक तो है - किन्तु जिम्मेदारी से पूरी तरह परे है।
‘भारत की बर्बादी’ के बुद्धिहीन नारे के विरोध में डर पैदा करने वाले अतिवादी, दक्षिणपंथी हैं। राइट।
जेएनयू की श्रेष्ठ परम्पराओं पर, अपनी सुविधा से आपत्ति उठाने वाले दक्षिणपंथियों को इस बार शक्तिशाली मुद्दा मिल गया है। वे स्वयं को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ कहते हैं। उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार ‘आधुनिक’ होने की बात कर रही है। इसमें न केवल विचारधारा पर आधुनिक परिवर्तन की बात है -जैसे कश्मीर में धारा 370 पर नए सिरे से समीक्षा-बातचीत-विमर्श करना- बल्कि पहरावे में भी नए जमाने के साथ चलना शामिल है - जैसे संघ के खाकी निकर की जगह फुल पैंट पहनाने का प्रस्ताव।
किन्तु ये मात्र बाते हैं। पूरा दक्षिणपंथ अतिवाद से ओतप्रोत है। विशेषकर अपने बूते पर बनी नरेंद्र मोदी सरकार के बाद उसके तेवर तीखे और बोल कड़वे हो गए हैं। लव जिहाद, धर्मांतरण, ‘पाकिस्तान चले जाओ’ जैसे नारे गूंजते जा रहे हैं।
हमेशा देश को बहुसंख्यकों की मातृभूमि बताकर अल्पसंख्यकों को डराकर रखने वाली प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं दक्षिणपंथी।
किन्तु, इस बार उनका ‘पाकिस्तान चले जाओ’ वाला सपाट, चुभने वाला तीर काम कर गया।
चूंकि, पाकिस्तान ज़िंदाबाद की गूंज भी तो थी जेएनयू के उस शोर में।
इससे पहले ऐसा कश्मीर में ही होता पाया गया है।
और यह अलग बात है, विचारणीय है, कि ऐसा तब से बहुत बढ़ गया जब से जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा की साझा सरकार बनी।
किन्तु वहां ‘आज़ादी’ का खोखला, अलगाववादी नारा है। वर्षों से है। बना हुआ है/रहेगा। किराये के आतंकियों, घुसपैठियों, सीमा पार से भागकर आए अपराधियों के पक्ष में चुनिंदा ताकतें हैं जो ऐसा कर रही हैं।
देशद्रोह।
किन्तु जेएनयू के ये कौन से छात्र हैं जो ऐसा सोचने लगे? कहने लगे? करने लगे? उन्हें किसी ने यह कभी क्यों नहीं समझाया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक जुमला नहीं है। संविधान के अनुसार दिया गया श्रेष्ठ अधिकार है। इसका दुरुपयोग दुखदायी होगा।
उन्हीं के लिए।
क्या किसी शिक्षक या वामपंथ ने उन्हें नहीं बताया कि ‘डेमोक्रेसी’ और ‘रिपब्लिक’ में वो एक महीन अंतर क्या है?
हमारा कोई पंथ नहीं है। हम किसी विचारधारा से बंधे हुए भी नहीं हैं। हमारा कोई ‘वाद’ तो ख़ैर है ही नहीं। किन्तु साधारण भारतीय नागरिक के रूप में हमें बचपन में ही बता दिया गया था यह अंतर। डेमोक्रेसी यानी लोगों की सत्ता। जिसमें हम ही सर्वोच्च होंगे। स्व-शासन। लोकतंत्र। रिपब्लिक यानी लोगों की सर्वोच्चता को एक तयशुदा ढांचे में ढालना -जिससे कि संविधान, न्याय, कानून, सरकार, चुनाव आदि व्यवस्थाएं बन सकें।
संदर्भ यही है -कि मात्र डेमोक्रेसी तो लाखों-करोड़ों लोगों की अराजक सत्ता में बदल सकती है। रिपब्लिक होने से ही डेमोक्रेसी स्थापित होती है। सच्चे स्वरूप में।
इसीलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक आदर्श व्यवस्था है। किन्तु संविधान-विराेधी कृत्य दंडनीय अपराध।
कश्मीर आज़ादी मांगे, आमिर खान की धर्मपत्नी आशंकित हो देश छोड़ने का भाव व्यक्त करे या जेएनयू में ऐसी मांग, कुछ मुट्ठीभर उठाएं -ये सब एक बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में आ भी जाए -किन्तु भारत की बर्बादी? वो कैसे आएगी, किस अधिकार के अंतर्गत?
माकपा, भाकपा, भाले-माले, फॉरवर्ड ब्लॉक, लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, लेफ्ट सेक्युलर फ्रंट, पोलितब्यूरो, कम्युनिस्ट पार्टी की इस-इस नंबर की कांग्रेस -कोई तो बताए?
इस कांग्रेस का अर्थ तो खैर, अधिवेशन-सम्मेलन है। किन्तु जेएनयू बवंडर में कांग्रेस की भूमिका एक अलग ही तरह की है।
उन्होंने अपने पूर्व कानून मंत्री को सामने किया है। जाे ‘सावधानियां’ गिना रहे हैं। इस बात की कि ‘देशद्रोह’ का मुकदमा करना ठीक है क्या? एक बार कांग्रेस के बारे में पुन: सोचें।
उन्हें देश के संविधान की चिंता नहीं है। कानून की परवाह नहीं है। उन्हें तो उस मुकदमे का दर्द सता रहा है।
दुर्भाग्य है।
ये वहीं कांग्रेस है, विचारधारा में लेफ्ट ऑफ द सेंटर, जिसने उस आतंकी को, बड़ी मुश्किल से ही सही, किन्तु फांसी पर लटकाया था। उसी आतंकी को, जिसके पक्ष में वामपंथी रुझान वाले छात्र इकट्ठे होकर ‘भारत की बर्बादी’ का दिवास्वप्न देख रहे थे।
हमारे यहां किसी आतंकी को फांसी देना एक दुरुह, दुर्गम, अनंत यात्रा की पीड़ा झेलने के समान है। सभी जानते हैं। हम उसे विधि-विधान से इतनी सहायता देते जाते हैं कि एक तरह से समूचा कानून, समूची न्याय व्यवस्था उस आतंकी के पक्ष में खड़ी नज़र आती है।
इससे उद्वेलित, मैं बार-बार लिखता हूं कि यह हर तरह से अन्याय है -क्योंकि न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का है। जिसे हम भुला देते हैं। तड़पता छोड़ देते हैं। ऐसे हाल ही के इितहास के बावज़ूद यदि नेताओं की कतार, देशद्रोहियों के पक्ष में अपनी-अपनी तरह से खड़ी होती जाएगी तो परिणाम अराजकता ही होगा।
किन्तु, हां -एक अंतिम तर्क।
भारत की श्रेष्ठता किसी पंथ, वाद, विचारधारा, आइडियोलॉजी की मोहताज नहीं है। भारत की सर्वोच्च शक्ति ही इसके साधारण नागरिक हैं। पूरा भारतीय इतिहास ही पराजित शासकों का इतिहास है। और नागरिकों के दम पर ही ये विजयी होकर बना हुआ है। और उन्हें समय-समय पर जो कुछ सहज, सरल व काम का लगता है -उसे वे अपना लेते हैं। और उसमें भी वे बंधते नहीं हैं। लचीले हैं।
निरंतर परिवर्तनशील हैं।
उनका अपना एक वैल्यू सिस्टम है। जैसे परिवार में सब लड़ते-झगड़ते हैं। उतना ही एक-दूसरे का ध्यान भी रखते हैं। त्याग करते हैं। फैमिली वैल्यू सिस्टम है। यही फिर बड़ा आकार लेकर भारतीय समाज की रचना करता है।
जो देश का, सभी धर्मों, सभी संस्कृतियों का सम्मान करने के आधार पर बना समाज है।
इसीलिए भारत की ‘बर्बादी’ हो ही नहीं सकती। कभी भी।
बर्बाद करने आए मुग़ल साम्राज्य का एक वारिस भी आज ढूंढे नहीं मिलता। बर्बाद करने आए ब्रिटिश साम्राज्य की दयनीय स्थिति यह है कि उनके प्रधानमंत्री, हमारे प्रधानमंत्री से इच्छा जाहिर करते हैं कि ‘ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री मूलत: एक भारतीय हो!’
सबसे बड़े भारत-विरोधी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने महात्मा गांधी को ‘भूखा-नंगा फकीर’ कहा था -उसी फकीर की विराट प्रतिमा -उन्हीं की छाती पर ब्रिटेन की संसद ने ही लगवाई है!
और, भारत की बर्बादी की कामना करते हुए इतने किराये के आतंकी खड़े करने वाला देश पाकिस्तान -उसकी क्या हालत है? हम सब देख ही रहे हैं। एक ऐसा भू-भाग -जो हमसे अलग होकर एक पूरा, सभ्य देश कभी बन ही न पाया। ऐसी जगह -जहां कोई सुरक्षित नहीं -बिन लादेन भी नहीं।
भारत, किसी भू-भाग का नाम नहीं है। भारत माता है। विश्व-गुरु है। शांति-पुंज।
यह सच सभी को साफ दिखे असंभव है, किन्तु दिखाना ही होगा -
मुझे, आपकी ही तरह, गर्व है कि मैं भारतीय हूूं। सौ जन्मों तक पुण्य किए होंगे।
और, कोई शर्म नहीं कि यहां भड़काने वाले राजनीतिक दल बने ही हुए हैं।
क्योंकि, यह उदारता ही भारतीयता है।
हां, देशद्रोहियों के प्रति कोई उदारता हमारी न्याय व्यवस्था में नहीं होनी चाहिए।
जय हिन्द।
(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)