DB Special: आखिर क्यों हमारे देश में समय पर नहीं पहुंच पाती हैं एम्बुलेंस / DB Special: आखिर क्यों हमारे देश में समय पर नहीं पहुंच पाती हैं एम्बुलेंस

गंभीर सड़क दुर्घटना में घायल 49% ही एम्बुलेंस से पहुंचते हैं अस्पताल।ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश में एम्बुलेंस की कमी है या फिर ये समय पर पहुंच नहीं रही हैं?

Bhaskar news

Sep 11, 2016, 02:00 AM IST
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नई दिल्ली. दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के टिकरापारा में मरीज को ले जा रही एम्बुलेंस रास्ते में खराब हो गई। मरीज को एक घंटे के बाद दूसरी एम्बुलेंस मिली। उसे सांस लेने में तकलीफ होती रही। लेकिन एम्बुलेंस में ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं था। दरअसल, यहां 1100 एम्बुलेंस में से एक तिहाई खटारा हैं। रोड एक्सीडेंट में 49% जख्मी ही एम्बुलेंस से पहुंच पाते हैं हॉस्पिटल, सिर्फ 5 लाख रुपए में फिर भी कमी...
- एम्बुलेंस को लेकर लगातार देश भर से खबरें आ रही हैं। कहीं मरीजों को ठेले पर अस्पताल पहुंचाया जा रहा है तो कहीं ऑटो से। ऐसे में भास्कर ने देश में एम्बुलेंस की स्थिति को लेकर पड़ताल की तो पता चला कि देश में एक लाख की आबादी पर मात्र एक एम्बुलेंस है, जबकि सरकार कहती है कि उसकी कोशिश है कि 60 हजार की आबादी पर एक एम्बुलेंस उपलब्ध हो।
- दूसरी तरफ वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ( डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार 10 मिनट में एम्बुलेंस मरीज तक पहुंच जानी चाहिए, लेकिन हमारे यहां अधिकांश मामलों में तो 30 मिनट तक लग जाते हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक देश में किसी गंभीर रोड एक्सीडेंट के हो जाने पर मात्र 11 से 49 परसेंट मरीज ही एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंच पाते हैं।
राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही है 34 हजार एम्बुलेंस
- पूरे देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और राज्य सरकारों द्वारा लगभग 34 हजार एम्बुलेंस चलाई जा रही हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि प्रति एक लाख की आबादी में मात्र एक बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) एम्बुलेंस उपलब्ध है।
- इसी तरह हर एक लाख की आबादी में एक एडवांस लाइफ सपोर्ट (एएलएस) एम्बुलेंस ही मौजूद है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में निदेशक कैप्टन कपिल चौधरी कहती हैं कि एम्बुलेंस उपलब्ध कराने के लिए राज्यों को आगे आने की जरूरत है।
- हम मांग के आधार पर स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों को पैसा उपलब्ध करा सकते हैं। सेव लाइफ फाउंडेशन के ऑपरेशन प्रमुख साजी चेरियन का कहना है कि भारत में मौजूदा ज्यादातर एम्बुलेंस सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले वाहनों में स्वास्थ्यकर्मी आपातकालीन सेवाओं के लिए ट्रेंड नहीं होते। दुर्घटनाओं के बाद होने वाली मौतों की एक बड़ी वजह यह भी है।
सिर्फ 5 लाख रुपए में एम्बुलेंस फिर भी कमी
- सामान्य मारुति वैन से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को लाने-ले जाने में इस्तेमाल होने वाली एम्बुलेंस की कीमत 5 लाख तक होती है। बावजूद इसके अस्पताल एम्बुलेंस खरीदने से बचते हैं।
- बेसिक लाइफ सपोर्ट वाली एक एम्बुलेंस की कीमत 10 लाख होती है। एडवांस लाइफ सपोर्ट सुविधा श्रेणी की कीमत 15 लाख रु. होती है। देश में महंगी एम्बुलेंस 70 लाख रु. तक की हैं।

ये सुविधाएं होना चाहिए

- ऑटोमेटिक स्ट्रेचर, जीवन रक्षक दवाएं, ब्लड प्रेशर इक्विपमेंट, स्टेथेस्कोप, दो ऑक्सीजन सिलेंडर, फर्स्ट एड बॉक्स जैसे बेसिक लाइफ सपोर्ट सिस्टम।
- 30 मिनट अधिकांश मामलों में मरीजों तक एम्बुलेंस को पहुंचने में लगते हैं। जबकि यह समय अधिकतम 10 मिनट होना चाहिए।
- 70 हजार ऐसे लोगों की जान हर साल एम्बुलेंस उपलब्ध कर बचाई जा सकती है जो राजमार्गों पर दुर्घटना के शिकार होते हैं।
कमी दूर नहीं हुई जबकि बाइक, बोट भी बनीं एम्बुलेंस
-तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों ने सैकड़ों की तादाद में टू-व्हीलर एंबुलेंस सेवाएं शुरू कर दी हैं। यूपी में बाइक एम्बुलेंस का प्रस्ताव है।
-सूरत जिले में लोगों ने ऑटो-एंबुलेंस सेवा शुरू की है। इस एंबुलेंस से मरीजों को आपात स्थिति में गांवों से 30 किमी दूर अस्पताल तक ले जाया जाता है।
-असम सरकार ने 2009 में मजूली जिले में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए बोट एंबुलेंस का इस्तेमाल शुरू किया। केरल और महाराष्ट्र में भी बोट सेवा शुरू की है।
-पिछले महीने डायरेक्टर जरनल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) ने देश के पहले एयर एंबुलेंस हेलिकॉप्टर को भारत में सेवा देने के लिए अनुमति दी है।
आगे की स्लाइड्स पर पढ़ें : हाईवे पर प्रति 50 किमी पर एक एंबुलेंस तैनात करना जरूरी...
कंटेंट : नई दिल्ली से प्रदीप सुरीन, मुंबई से संतोष काळे जयपुर से सुरेन्द्र स्वामी और पटना से इन्द्रभूषण
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हाईवे पर प्रति 50 किमी पर एक एंबुलेंस तैनात करना जरूरी
 
- सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार हाईवे पर प्रति 50 किमी पर एक एंबुलेंस तैनात करना अनिवार्य है।
- लेकिन हाईवे पर सर्विस प्रोवाइडर ऐसी व्यवस्था के नाम पर मात्र एक साधारण गाड़ी में ड्राइवर तैनात कर देते हैं जो इमरजेंसी की स्थिति में घायलों को पास के अस्पताल तक ही पहुंचाना जानते हैं। जबकि ज्यादातर सड़क दुर्घटनाओं में तुरंत इलाज शुरू करना होता है।
- साजी चेरियन का कहना है - विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार मैदानी इलाकों में प्रति लाख जनसंख्या में एक एंबुलेंस और पहाड़ी-कठिन इलाकों में प्रति 70 हजार की आबादी में एक एंबुलेंस उपलब्ध होना चाहिए।
 
पिछले कुछ सालों में हुआ है सुधार
 
- वैसे पिछले कुछ सालों में एंबुलेसों की स्थिति में कुछ सुधार तो हुआ ही है। 1990 में प्रसव के दौरान प्रति लाख महिलाओ में से 560 की मौत हो जाती थी।
- लेकिन कुछ साल पहले शुरू किए गए जननी शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 30 मिनट के भीतर मुफ्त एंबुलेंस सेवा बहाल करने के बाद मातृ-मृत्युदर में भारी गिरावट आई है।
- डिलीवरी के लिए समय से अस्पताल पहुंचने का ही परिणाम है कि 2015 में प्रसव के दौरान प्रति लाख महिलाओं में अब मात्र 167 महिलाएं की दम तोड़ रही हैं। निजी एजेंसियां भी इस क्षेत्र में आगे आ रही हैं।
- आंध्र प्रदेश से संचालित होने वाली संस्था जीवीके-ईएमआरआई पिछले कुछ सालों से एंबुलेंस सेवा को दुरुस्त करने के लिए राज्य सरकारों के साथ साझा सेवा उपलब्ध करा रही है।
- संस्था की लीड पार्टनर चंदन दत्ता ने कहा “दुर्घटना में घायलों और मरीजों को समय से एंबुलेंस सेवा उपलब्ध कराने के लिए हम 16 राज्य सरकारों के साथ लगभग 10 हजार से ज्यादा एंबुलेंस चला रहा हैं।
- इनमें से 3579 एंबुलेंस सिर्फ गर्भवती महिलाओं और शिशुओं को अस्पताल लाने-ले जाने के लिए तैनात हैं। इसके बावजूद आपात स्थिति में एंबुलेंस उपलब्ध कराने के लिए अभी लंबी दूरी तय करना बाकी है।”
 
आगे की स्लाइड्स पर पढ़ें :  एयर एंबुलेंस के लिए पहला हेलिकॉप्टर भारत आ चुका है
 
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एयर एंबुलेंस के लिए पहला हेलिकॉप्टर भारत आ चुका है
 
- इसी तरह मुंबई से संचालित होने वाली कंपनी चिकित्सा हेल्थकेयर लिमिटेड 1298 और 108 हेल्पलाइन के लिए 17 राज्यों में 786 एंबुलेंस मुहैया करा रही है।
- एयरबस हेलिकॉप्टर के प्रमुख जेवियर हे का कहना है कि एयर एंबुलेंस के लिए पहला हेलिकॉप्टर भारत आ चुका है। दो और हेलिकॉप्टर जल्द आने की उम्मीद है।
- महानगरों में बढ़ते ट्रैफिक की वजह से मरीजों को सड़क मार्ग से अस्पताल पहुंचाना असंभव सा होने लगा है। ऐसे में एयर एंबुलेंस ही महानगरों के लिए एक सही विकल्प है। 
 
92851 हजार किमी नेशनल हाईवे के लिए है मात्र 106 एंबुलेंस
 
हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गड़गरी ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि विभिन्न राज्यों से जुड़े राष्ट्रीय राजमार्गों में कुल 106 एंबुलेंस तैनात किए गए हैं।
- सरकार ने राजमार्गों में सालाना होने वाली दुर्घटनाओं के मामलों को ध्यान में रखकर इन एंबुलेंसों को रखने का स्थान चुना है। राजस्थान के चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ बताते हैं कि राजस्थान देश का पहला राज्य है, जहां इंटीग्रेटेड एम्बुलेंस की सुविधा है।
- यानि 108 या 104 पर इमरजेन्सी, जननी, बेस एम्बुलेंस तथा चिकित्सा परामर्श की सुविधा है। सॉफ्टवेयर से काल करने वाले व्यक्ति के मोबाइल पर एम्बुलेंस का नंबर व चालक के मोबाइल नंबर चला जाता है।
- बिहार में सरकारी एम्बुलेंस 798 है। इसके अतिरिक्त निजी एम्बुलेंस 1000 से ऊपर है। राज्य की आबादी 11 करोड़ के हिसाब से प्रति लाख पर एक एम्बुलेंस यानि कुल 1100 की जरूरत है।
- सरकारी और निजी मिलाकर एम्बुलेंस की कमी नहीं है पर सिर्फ सरकारी स्तर पर बात करें तो 302 एम्बुलेंस की कमी है। झारखंड में 650 एंबुलेंस है। ये जरुरत से अभी 329 कम है। इसमें सरकारी दो सौ और निजी एंबुलेंस 450 है।
- स्वास्थ्य विभाग के एंबुलेंस व्यवस्था के नोडल अफसर डॉ एसके चौधरी ने बताया कि वर्तमान सरकार एंबुलेंस व्यवस्था को सुदृढ़ करने में जुटी है। गत जून में 80 एंबुलेंस जिला अस्पताल और सीएचसी को सौंपे गए थे।
 
मध्यप्रदेश में जारी किया 108 नंबर
 
- दिसंबर में 115 हाईटेक एंबुलेंस सरकारी अस्पतालों को बांटने की योजना है। इसके बावजूद अभी भी 215 एंबुलेंस की कमीं है। जिसे जल्द पूरा किया जाएगा। झारखंड में एंबुलेंस बुलाने का कोई टोल फ्री नंबर नहीं है।
- इस साल दिसंबर में एंबुलेंस के लिए 108 नंबर जारी किया जाएगा। मध्यप्रदेश में संचालित जननी एक्सप्रेस एंबुलेंस में मरीज की हालत बिगड़ने पर उसका इलाज करने कोई मेडिकल टेक्नीशियन अथवा डॉक्टर ड्यूटी नहीं करता।
- मरीज को एंबुलेंस ड्राइवर के भरोसे घर से अस्पताल तक का सफर करना होता है। इसके अलावा इस एंबुलेंस में इमरजेंसी के लिए आक्सीजन सिलेंडर भी नहीं है।
- इस कारण दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज घर से अस्पताल जाने के लिए इमरजेंसी में 
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DB Special: Problem Of Delay In Ambulance In India
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