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‘रंग दे’ से उन्हें लोन मिलता है, जिन्हें बैंक ठुकरा देते हैं

5 वर्ष पहले
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बेंगलुरु. इस बैंक से कर्ज लेने के लिए न तो बैंक अकाउंट की स्टेटमेंट चाहिए और ना ही इनकम टैक्स का सबूत। रिकवरी का डर भी नहीं। बस ये पता होना चाहिए कि लोन कितना जरूरी है। राष्ट्रीय बैंकों द्वारा ठुकरा दिए गए लोगों को लोन उपलब्ध कराता है ‘रंग दे’ बैंक। यह पहले सोशल मीडिया के जरिए इनवेस्टर्स जुटाता है। फिर रकम जरूरतमंद तक पहुंचाता है। 100 से लेकर लाखों रुपए तक मदद करने वाले 8700 इनवेस्टर्स इस समय रंग दे के साथ हैं। वह अब तक 37 करोड़ रुपए के लोन बांट चुके हैं।

‘रंग दे’ के फॉउंडर राम कुमार बताते हैं कि वे विजयवाड़ा से इंजीनियरिंग कर अमेरिका चले गए थे। वहां प्रिंसिपल साफ्टवेयर कंसल्टेंट थे। लेकिन मन में देश लौटने की इच्छा थी। पत्नी स्मिता ने मेरा पूरा समर्थन किया। उन्हीं दिनों मोहम्मद युनुस (ग्रामीण बैंक) को नोबेल अवॉर्ड मिला था। राम हैदराबाद लौटे तो पता लगा कि यहां 50% रोजाना के ब्याज पर रेहड़ी और छोटे-मोटे काम करने वालों को लोन मिलता था। यह देखकर उन्होंने माइक्रो लोन दिलाने के लिए निवेशक तलाशने शुरू किए।
वे कर्ज के जरूरतमंद व्यक्ति की कहानी अपनी वेबसाइट और फेसबुक पेज पर डालते हैं। जो लोग भी उनकी मदद करना चाहें वे ‘रंग दे’ को पैसा दे सकते हैं। कम से कम 100 रुपए का निवेश किया जा सकता है। व्यक्ति की जरूरत और कहानी जानने के बाद इनवेस्टर तय करते हैं कि उन्हें किसी को कितनी रकम देनी है। 2008 से काम कर रही ‘रंग दे’ एक व्यक्ति को अधिकतम 50 हजार तक का लोन देती है। आज तक एक रुपया भी नहीं डूबा है। हर इनवेस्टर का अलग खाता है। उसे जानकारी रहती है कि उसका पैसा इस समय किस कर्जदार के पास है।

‘रंग दे’ बैंक 2% से 10% सालाना ब्याज दर पर लोन देती है। 10% लोन बिजनेस पर है। इसमें 2-2% बैंक और आॅनलाइन इनवेस्टर को मिलता है। कुछ हिस्सा ऐसे लोगों पर खर्च होता है जो री-पे नहीं कर पा रहे हैं। ये लोन दो हजार रुपए से शुरू होते हैं जो हाल ही में झारखंड के आदिवासियों को दिए गए। अब वे रस्सी खरीद कर बास्केट बनाते हैं और उसे बेचकर रकम लौटा देते हैं। मैसूर फूड वेंडर्स और बेंगलुरू के साड़ी बुनकरों की संस्था उनकी सफलता की कहानी कहती है।
वे कहते हैं कि सस्ता लोन मिलने से आय दोगुनी हो गई। बुनकरों को क्रेडिट एक्सेस नहीं मिलता। इसलिए उन्होंने ‘चरखा’ देकर मदद की। ‘रंग दे’ की सात फुल टाइम मेंबर्स की टीम है जो अमेरिका, इंग्लैंडे और भारत में है। पार्टनर्स संस्था यानि एनजीओ ही कर्ज लेने वाले के कागजात (आधार या राशन कार्ड) का रिकॉर्ड रखती हैं। लोन अमाउंट इकट्‌ठा करके ‘रंग दे’ उनको दे देती हैं। एनजीओ का फील्ड स्टाफ पैसा कलेक्ट करता है। इस तरह वापस आया पैसा रंग दे के अकाउंट में जाता है।

ऐसे चुनते हैं ग्राहक

जरूरतमंद की कहानी वेबसाइट और फेसबुक पेज पर डालते हैं। जो लोग मदद करना चाहते हैं, वे रंग दे के अकाउंट में पैसा डालते हैं। इन्वेस्ट की सीमा भी तय। मिनिमम 100 रुपए निवेश कर सकते हैं। लोन की सीमा मिनिमम 2 हजार और अधिकतम 40 से 50 हजार रुपए।
किन्हें देते हैं लोन

किराना स्टोर, साइकिल रिपेयर शॉप, मोबाइल सर्विस सेंटर, बेकरी, सेकेंड हैंड क्लॉथ, कसाई का बिजनेस है सहित चार सौ तरीकों के लोन देते हैं। कर्नाटक, केरला, मप्र, यूपी, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार, वेस्ट बंगाल, आसाम सहित 15 राज्यों में वह एनजीओ की मदद से काम कर रहे हैं।
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