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मीलों तक हम अा चुके, मीलों तक जाना है

5 वर्ष पहले
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मैं 9 साल की थी तब मुंबई में ग्रांट रोड इलाके के एक स्कूल क्वीन मेरी में पढ़ती थी, यह स्कुल हमारे घर केे करीब था। फिर हम जुहू में शिफ्ट हुए, जहां से उस स्कूल की दूरी 14 किलोमीटर थी। मैंने कहा मैं उसी स्कूल में जाऊंगी। मेरी मां ने तीन महीने मेरे साथ आया भेजी। उसके बाद मैं अकेली जाती थी। 9 साल की बच्ची जुहू चर्च से बस लेती, फिर सांताक्रूज उतरती, वहां से स्टेशन ट्रेन से जाती फिर ग्रांट रोड से उतरकर 20 मिनट चलती। तब कही स्कूल पहुंचती थी। आज के दौर में कोई मां शायद अपनी बच्ची को इतने लंबे सफर पर अकेले भेजने की हिम्मत भी न कर सके। मेरी मां ने इसी तरह मुझमें आत्मविश्वास भरा, लेकिन अगर मैं 6 बजे घर पर नहीं पहुंची तो उनके आंसू शुरू हो जाते। उनके आंसू बता देते थे कि कितनी देर हुई है। 6 बजे आंखें भरती, 6 बजकर 5 मिनट पर हलके आंसू निकलते और 6:15 पर तो दिल बैठ जाता था उनका। मेरी मां गैर-मामूली औरत रही हैं। उन्होंने जिस तरह से मेरी परवरिश की, मैं नहीं मानती की आज के समय में कोई कर सकता है। वे कभी सख्त नहीं थीं, लेकिन मुझे सच बोलना सिखाया। एक मर्तबा मैंने उनसे कहा कि आप मेरे भाई को मुझसे ज्यादा चाहती हैं। वह ऐसा दौर था मेरी जिंदगी का जिसमें मैं बदतमीजी से गुजर रही थी। उन्होंने कहा, ‘देखो मैं तुम्हारी मां हूं, लेकिन इंसान भी हूं। तुम बदतमीजी से पेश आती हो और तुम्हारा भाई बहुत मिठास से पेश आता है तो जाहिर है मैं उसे ज्यादा पसंद करती हूं। आज मैं उन्हें कहती हूं कि आपको तब लगा नहीं कि ये बात मुझे चुभेगी। उन्होंने कहा, ‘लेकिन सच तो सच है।’ मां के सच का नतीजा यह हुआ कि मैं बेहूदगी छोड़कर सीधी हो गई। आज मैं जो भी हूं उसमें सिर्फ और सिर्फ उनकी परवरिश की ठोस नींव है। यकीन कीजिये, मैं आज भी घर से निकलती हूं तो मेरी मां मुझसे पूछती हैं नाश्ता किया? खाना कहां खाओगी?

जब कॅरिअर शुरू किया तो मुझ पर दबाव होता था। हीरो बहुत बड़ा है, पेयरिंग अच्छी है, बैनर बड़ा है। अब बैनर या नया डायरेक्टर कोई मायने नहीं रखता। मैं यंग डायरेक्टर्स के काम को, उनकी सोच को पसंद करती हूं। अपने कॅरिअर में मैंने सबसे ज्यादा नए निर्देशकों के साथ काम किया है, शेखर कपूर, मनीष आचार्य, प्रवीन भट्‌ट, विजय तलवार, कल्पना लाजमी, अरुणा राजे, सई परांजपे, विजया मेहता और आज राम माधवानी। नई सोच हमेशा ताज़गी के साथ आती है। नए लोग पहली बार में कुछ कर गुजरना चाहते हैं, इसलिए अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा जुझारू होते हैं। सिनेमा की दुनिया को आप चकाचौंध भरा मानते हैं, लेकिन हकीकत की दुनिया भी है। मैं आपको मिजबा की कहानी बताती हूं। मिजबा की नींव अब्बा ने डाली थी, मैंने तो सिर्फ अपने हिस्से का योगदान दिया। जब वे वहां लौटकर गए 90 के दशक में। तब वह ऐसा गांव था, जो वक्त में ठहर गया था। स्कूल-कॉलेज तो दूर सड़क और बिजली भी नहीं थी। अब्बा ने अकेले जिम्मा उठाया, क्योंकि उनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं था। अगर वे ‘औरत’ नज़्म लिखते तो अपनी बीवी, बेटी या बहु के साथ वही समानता का व्यवहार करते। कला के माध्यम को सामाजिक बदलाव के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कोई भी मुल्क या समाज सभ्य नहीं कहला सकता अगर उनकी 50 फीसदी आबादी को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता है, लेकिन हिंदुस्तान ऐसा मुल्क है जो कई सदियों में एक साथ जीता है। हम 18वीं सदी में भी हैं और 21वीं सदी में भी हैं। एक जगह तो महिलाएं कामयाब हैं, लेकिन कई जगहों पर लड़की को पैदा होने से पहले या पैदा होते ही मार दिया जाता है। ये किसी गांव या कबीले में नहीं, हमारे शहरों में हो रहा है।

जहां तक संघर्ष, सफलता और संतुष्टि की बात तो कुछ ऐसी है, ‘मीलों हम आ चुके हैं, लेकिन मीलों हमें आगे जाना है। मैंने एक बार अब्बा से पूछा, ‘आप जितनी रफ़्तार से तब्दीली के लिए काम करते हैं, उतनी रफ़्तार से तब्दीली आती नहीं है।’ उन्होंने जवाब में जो कहा वह मेरा मंत्र बन गया। उन्होंने कहा, ‘बेटा जब आप तब्दीली के लिए काम कर रहे हो तो ये गुंजाइश भी रखो कि शायद तब्दीली न भी आए, लेकिन यकीन रखो कि अगर पूरी सच्चाई और मेहनत से काम करते रहे तो तब्दीली आएगी, चाहे आपके जाने के बाद आए।’ ये बात खासतौर से मिजबा में सही साबित हुई क्योंकि मानसिकता बदलने में वक्त लगता है। मैं तो एक छोटा-सा हिस्सा हूं, उस पहिये का, जो चल रहा है बदलाव का। बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं। लड़कियां सपना देखेंगी तभी तो उसे पूरा कर सकेंगी। हमारे गांवों-कस्बों में महिलाओं के पास सपने देखने का वक्त ही नहीं है। वे सुबह से रात तक घर और खेतों में सिर्फ काम करती हैं। मिजबा वेलफेयर सोसाइटी के जरिये महिलाओं, बच्चियों को सपने देखने के उनके अधिकार से वाकिफ करवा रहे हैं।

कुछ समय पहले तक वहां लड़कियां सिर्फ टीचर बनने की बात कहती थीं, लेकिन अब वे लोग एक्टर या पायलट बनने का सपना भी देखने लगी हैं। मिजवा की महिलाओं का आत्म-विश्वास बढ़ता है, जब वे देखती है कि उनके कढ़ाई किए हुए कपड़े प्रियंका चोपड़ा और अन्य अभिनेत्रियां पहन रही हैं। उनके इंस्टालेशन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर ख्यात डिज़ाइनर के साथ लगे हैं। हर साल उनकी कशीदाकारी के कपड़े मनीष मल्होत्रा डिज़ाइन करके बड़े कलाकारों को रैंप पर लाते हैं। मनीष तो मिजबा से जुड़कर खुद में बदलाव महसूस करते हैं। संघर्ष की कहानियां आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। मीडिया और फिल्मों में हमेंं पॉजिटिव रोल मॉडल लाने चाहिए। ये रोल मॉडल भी हमारे बीच की ही लड़कियां हों। मुझे गिलास आधा भरा हुआ ही लगता है। खाली हिस्से मेरे लिए है ही नहीं। हर तरफ लोगों में कुछ असंतोष है, दर्द है। ऐसे में नकारात्मकता आएगी ही, क्योंकि हम बदलाव की प्रक्रिया में हैं। इस दौरान आपको अपना काम करते रहना चाहिए। देखिए, सबसे आसान बात तो यह है कि आप हाथ पर हाथ धर के बैठ जाएं कि मैं इतनी छोटी-सी हूं, मैं क्या कर सकती हूं । एक कतरा हूं समंदर का, लेकिन कतरा-कतरा जमा होकर ही समंदर बनता है। हर इंसान किसी भी तह तक जाकर किसी एक इंसान, सिर्फ एक इंसान की भलाई कर सकने की नियत रख ले तो बड़ी बात है। आप दुनिया बदलने मत जाओ, लेकिन जो महिला आपके घर आती है सफाई के लिए उससे पूछ लो क्या तुम्हारी बेटी स्कूल जाती है? उसके लिए, उसकी पढ़ाई के लिए क्या कर सकते हैं। खुद से यह सवाल पूछो तो भलाई खुद-ब-खुद शुरू हो जाएगी। आपको सिर्फ अपने अलावा किसी एक इंसान के बारे में सोचना है। उनकी तो होगी ही, लेकिन आपकी जिंदगी ज्यादा बेहतर हो जाएगी इससे। सकारात्मकता ऐसे ही तो फैलती है।
(जैसा उन्होंने सलोनी अरोरा को बताया)

शबाना आज़मी
फिल्म अभिनेत्री
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