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विविधता में एकता भारत की आत्मा है: सुषमा स्वराज

6 वर्ष पहले
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भारतमें धार्मिक सहिष्णुता पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की टिप्पणी के कुछ दिन बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बुधवार को कहा कि विविधता में एकता, अहिंसा और सहिष्णुता देश की आत्मा है, जिसने उसे दुनिया की सबसे पुरानी सतत सभ्यता बनाया। भारतवासी और सांस्कृतिक धरोहर अतीत, वर्तमान और भविष्य’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए सुषमा ने कहा कि भारत की आत्मा क्या है?

मैं समझती हूं कि भारत की अत्यधिक विविधता के बीच यह हमारी एकता है। यह हमारी अहिंसा और सहिष्णुता है। यह सदियों पुराने वसुधैव कुटुम्बकम और सर्व धर्म-समभाव के सिद्धांत हैं।





विदेश मंत्री ने कहा कि इन विचारों और आदर्शों का पालन करने से ही भारत दुनिया की सबसे पुरानी सतत सभ्यता बनी है जिसका इतिहास पांच हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने कहा कि अधिकांश पुरानी सभ्यताएं समाप्त हो गईं और लुप्त हो गईं, लेकिन भारत ने अपनी समृद्ध धरोहर को बनाए रखा, इसका विकास किया और इसे समृद्ध बनाया। ऐसे समय में आया है जब हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि धार्मिक संघर्ष के करण भारत में असहिष्णुता पैदा हुई है जिससे महात्मा गांधी भी स्तब्ध रह जाते। विदेश मंत्री ने कहा कि हम ऐसे युग में रह रहे हैं जहां कई समाजों कर सांस्कृतिक धरोहर युद्ध, सामाजिक एवं आर्थिक उथल पुथल और वैश्वीकरण एवं सांस्कृतिक एक रूपी-करण की ताकतों के कारण खतरे में है। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक धरोहर स्मारकों एवं कलाकृतियों पर समाप्त नहीं हो जाती है। यह हमें बनाती है, जो हम हैं। सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण करने में भारतवंशियों की विशेष तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका है। कल समाप्त हुए भारतीय राजदूतों एवं उच्चायुक्तों के प्रमुखों के सम्मेलन का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि देश के दूत लाखों की संख्या में दुनिया में एनआरआई, भारतीय मूल के लोगों के रूप में फैले हैं जो भारत की आत्मा को जीवंत बनाए हुए हैं। सुषमा ने कहा कि भारत के प्रति आज दुनियाभर में जबर्दस्त उत्सुकता देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार आने के बाद काफी सघन उच्च स्तरीय यात्रा और दुनिया के साथ हमारी बातचीत के स्वरूप में गुणात्मक बदलाव बढ़ते सम्मान का सबूत है, जिस नजर से हमें दुनिया देख रही है। विदेश मंत्री ने जोर दिया कि इसे पुष्ट करने और भारत के बारे में उभरी शंकाओं को और बेहतर ढंग से पेश किये जाने की जरूरत है।