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गीता संबंधी सुषमा के बयान का विपक्ष ने किया विरोध
{सदन को विदेश मंत्री की यह मांग सिरे से खारिज कर देनी चाहिए: डी राजा
एजेंसी| नई दिल्ली
विदेशमंत्रीसुषमा स्वराज के भगवदगीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग संबंधी बयान की आलोचना करते हुए मंगलवार को राज्यसभा में विपक्षी दलों के सदस्यों ने कहा कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की ‘भयावह’ कोशिश है। शून्यकाल में भाकपा के डी राजा ने यह मुद्दा उठाते हुए मांग की कि सदन को विदेश मंत्री की यह मांग सिरे से खारिज कर देनी चाहिए। हालांकि सरकार ने सुषमा का बचाव करते हुए कहा कि गीता ‘धर्म ग्रंथ’ नहीं, बल्कि ‘कर्म ग्रंथ’ है।
संसदीय कार्य राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि जब भी ‘संस्कृति और संस्कार’ की बात होती है तो कुछ लोगों को लगता है कि धर्मनिरपेक्षता खतरे में है। इससे पहले राजा ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा ‘आप एक पवित्र पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक के तौर पर थोप नहीं सकते।’ उन्होंने कहा कि भारत बहुधर्मी और बहुभाषी देश है, जहां विभिन्न वर्ग विभिन्न धर्म ग्रंथों को पवित्र मानते हैं। यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने का भयावह प्रयास है।’ कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह सुषमा के बयान की निंदा करते हैं। माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि भारत के लिए पवित्र पुस्तक उसका संविधान है जो सबको समानता का अधिकार देता है। वाम, कांग्रेस और तृणमूल के कई सदस्यों ने स्वयं को इस मुद्दे पर राजा से संबद्ध किया।