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सोशल मीडिया पर टिप्पणियाें को लेकर गिरफ्तारी होना गंभीर मामला: सुप्रीम कोर्ट

7 वर्ष पहले
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सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र की दलील पर असहमति जताई कि सोशल वेबसाइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणियां पोस्ट करने की कुछ घटनाओं में ही गिरफ्तारियां हुई हैं। शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि अगर ऐसे मामले अपवाद भी थे, तब भी उनमें गिरफ्तारियां करना निरंकुश और गंभीर मामला है। एक जनहित याचिका पर गुरुवार को जस्टिस जे. चेलमेश्वर की बेंच ने सुनवाई की। यह सुनवाई आईटी कानून की धारा-66 पर हुई जो विवादों में है। यह धारा किसी संचार सेवा के जरिए आपत्तिजनक संदेश भेजने के आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार कर तीन साल को जेल भेजने का अधिकार प्रशासन को देती है। एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील सोली सोराबजी ने कहा, ‘संविधान में उल्लेखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा होनी चाहिए। आईटी कानून की धारा 66ए निरस्त होनी चाहिए। इसमें ‘बेहद अपमानजनक’, ‘चरित्र हनन’ और ‘पीड़ा पहुंचाती’ टिप्पणियों को ठीक तरह से परिभाषित नहीं किया गया है।

मंत्रीकी हालिया टिप्‍पणी का भी जिक्र हुआ: सुप्रीमकोर्ट की बेंच ने किसी का नाम लिए बिना एक केंद्रीय मंत्री (साध्वी निरंजन ज्योति) की हालिया टिप्पणियों पर संसद में हुए हंगामा का जिक्र किया। जजों ने कहा, ‘कोई टिप्पणी अपमानजनक है या नहीं, उसे अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। हर व्यक्ति के लिए अपमानजनक शब्दों के मायने अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन आलोचनाओं का गला घोंटने की कोई भी कोशिश सेंसरशिप की तरह होगी।’ इस मामले में सुनवाई बुधवार को जारी रहेगी।

ठाकरेके निधन के बाद मुंबई बंद के विरोध में टिप्पणी का है मामला : सुप्रीमकोर्ट एक छात्रा श्रेया की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। श्रेया ने ठाणे से शाहीन और रीनू श्रीनिवासन की आईटी कानून के तहत गिरफ्तारी के बाद यह याचिका दायर की थी। गिरफ्तारी की वजह यह थी कि एक लड़की ने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई बंद के विरोध में टिप्पणी की थी।

और दूसरी ने उसकी पोस्ट को लाइक किया था।