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चाल, चरित्र और चेहरा, तीनों ही नहीं बचा पाई भाजपा

6 वर्ष पहले
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विस चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार

संतोषठाकुर | नई दिल्ली

भाजपाके लिए दिल्ली विस चुनाव काफी सीख देने वाला साबित होता दिख रहा है। इस चुनाव में उसकी चाल, चरित्र और चेहरा, तीनों को जनता ने सिरे से नकार दिया। पार्टी की चाल की बात करंे तो उसने अपने लगभग ढाई दर्जन केंद्रीय मंत्रियों, करीब आधा दर्जन मुख्यमंत्रियों और 80 हजार से अधिक कार्यकर्ताओं की विशाल फौज को केजरीवाल के खिलाफ उतारा था। लेकिन यह चाल कामयाब नहीं हुई। केंद्रीय मंत्रियों की भीड़ से नाराज स्थानीय नेताओं ने चुनाव से पूरी तरह किनारा कर लिया जिसका नतीजा भाजपा की करारी शिकस्त के रूप में सामने आया।

चरित्र की बात करें तो भाजपा का अभी तक का इतिहास रहा था कि वह या तो अपने पुराने कार्यकर्ताओं में से किसी एक को अपना उम्मीदवार बनाती थी या केंद्रीय नेतृत्व के किसी बड़े चेहरे को लेकर चुनाव में जाती थी। चाहे फिर वह अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या लालकृष्ण आडवाणी या फिर नरेंद्र मोदी पहली बार उसने एक ऐसे शख्स पर दांव लगाया जो चुनाव से कुछ समय पहले तक भाजपा को ही कठघरे में खड़ा करती रही थी। अचानक से चरित्र के इस बदलाव को कार्यकर्ताओं ने हजम नहीं किया। उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। चेहरा, यह सबसे अहम मुददा था लेकिन भाजपा ने इसे अपनी कमजोर कड़ी बनाया। उसने आत्ममुग्ध किरण बेदी को अपना चेहरा बनाया।

इस पर भाजपा ने उन्हें डा. हर्षवर्धन की सीट रही कृष्णा नगर से उम्मीदवार बनाया। यह जानते हुए कि यहां की जनता भाजपा से यह सवाल कर रही है कि आखिर डा. हर्षवर्धन ने क्या गलती की है। उन्हें पहले स्वास्थ्य मंत्रालय से बिना कारण बताए ही अंतरिक्ष विज्ञान मंत्रालय भेज दिया गया। उनके इस ‘डिमोशन’ के बाद उनकी जगह किसी और के उम्मीदवार होने और वह भी उनकी ही सीट से उसे पेश करने को स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नहीं स्वीकारा। बेदी अब उन चुनिंदा सीएम उम्मीदवारों में शामिल हो गई हैं जो खुद चुनाव हार गए हों।