महा राष्ट्र नहीं, महाभारत
एनडीए
भाजपा24 23
शिवसेना 20 18
यूपीए
कांग्रेस27 02
एनसीपी 21 04
आस शिवसेनाउद्धव को, राकांपा अजित को सीएम प्रत्याशी घोषित कर सकती है। भाजपा गडकरी का नाम बढ़ा सकती है।
आसारचारोंएक दूसरे को धोखेबाज बताएंगे, लेकिन बहुमत नहीं मिला तो चारों फिर एक साथ भी सकते हैं।
अवसरकेंद्रसे शिवसेना अलग हो सकती है। सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार के बजाय मराठा अस्मिता पर लड़े जाएंगे चुनाव।
ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल थिएटर; महाराष्ट्र शो
राम के नाम पर एक, कुर्सी के लिए अलग
1989 मेंराम मंदिर आंदोलन में शिवसेना ने साथ निभाया। आडवाणी के कहने पर प्रमोद महाजन ने बाल ठाकरे से मिलकर गठबंधन बनाया। इसे हिंदुत्व की एकजुटता कहा गया। 1990 में साथ लड़े, 1995 में सत्ता में आए।
2014मेंमुद्दा हिंदुत्व के बजाय कुर्सी हो गया। शिवसेना झुकी, भाजपा। अब दोनों अकेले लड़ेंगे। एक दूसरे को कोसेंगे। सत्ता मिली तो ठीक, वर्ना नई रणनीति बनाएंगे।
घर की लड़ाई, कुर्सी में बदली
1999 मेंसोनिया के विरोध को आधार बना शरद पवार कांग्रेस से अलग हुए। एनसीपी बनाई। लेकिन विस चुनाव बाद साथ गए। अलगाव को घर की लड़ाई बताया।
2014मेंनेतृत्व अजित पवार के हाथ में। उन्हें सीएम की कुर्सी चाहिए। कांग्रेस को भी। इसलिए अलग हो गए।
पृथ्वीराज: महाराष्ट्रके सीएम। शुरू से राकांपा विरोधी। पार्टी को आश्वस्त कराया-एनसीपी की शर्तें मानीं तो राज्य में कांग्रेस खत्म हो जाएगी।
अजितपवार: शरदपवार के भतीजे। कांग्रेस के खिलाफ माहौल देखते हुए अलग होना चाहते थे। सालभर से कांग्रेस विरोध का बीड़ा उठा रखा था।
देवेंद्र फड़णवीस: भाजपाअध्यक्ष। मोदी और शाह के करीबी। नहीं चाहते थे देश में प्रचंड जीत के बाद भी शिवसेना के छोटे भाई ही बने रहें।
आदित्यठाकरे: उद्धवके बेटे। इन्होंने ही उद्धव के मन में सीएम पद की महत्वाकांक्षा जगाई। गुजरात लॉबी बनाम मराठा लॉबी का महौल बनाया।