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नेशनल टैक्स ट्रिब्यूनल असंवैधानिक : सुप्रीम कोर्ट
{एक चार्टर्ड अकाउंटेंट या कंपनी सेक्रेटरी एनटीटी में वादी का कैसे प्रतिनिधित्व कर सकता है। ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता।
{भले ही सीए को टैक्स के संबंध में अधिक जानकारी हो, लेकिन कानूनी दांवपेंच आने पर क्या वह इससे निपट सकता है?
{कानून से संबंधित मूल सवालों पर फैसला सिर्फ और सिर्फ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही कर सकते हैं।
{संसद न्यायपालिका के अधिकार छीनकर ट्रिब्यूनल को नहीं सौंप सकती, क्योंकि ट्रिब्यूनल खुद अदालत नहीं होते हैं।
{विधायिका, पारंपरिक अदालत से अलग अदालत या ट्रिब्यूनल को न्यायिक अधिकार दे सकती है। लेकिन जिस अदालत या ट्रिब्यूनल को ऐसे अधिकार दिए जा रहे हैं उनके पास पारंपरिक अदालतों के अधिकार जैसे स्वरूप, मानक और मापदंड होने चाहिए। एनटीटी के चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति का मापदंड अलग है लिहाजा इसे संवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
क्या है मामला :
एनटीटी की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के समक्ष थीं। इन याचिकाओं में दलील दी गई थी कि ऐसे कानून से इस बात का गंभीर खतरा है कि इस तरह न्यायपालिका की जगह विभिन्न मंत्रालयों के विभागों की तरह काम करने वाले तमाम ट्रिब्यूनल बना दिए जाएंगे।
इस मामले में पहली याचिका 2006 में दायर की गई थी। इसमें मद्रास बार एसोसिएशन ने एनटीटी के गठन को चुनौती दी थी। बाद में वकीलों की कई और एसोसिएशनों ने इस कानून को चुनौती दी। सरकार ने एनटीटी का यह कहते हुए बचाव किया था कि इसका उद्देश्य हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या कम करना है।