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मोदी-शाह की जोड़ी ने संघ के रास्ते पर बढ़ाया एक और कदम
आरएसएसनेलंबे समय से एकला चलो का पाठ भाजपा को पढ़ाया था। शिवसेना से गठबंधन तोड़कर अमित शाह और मोदी की जोड़ी इसी दिशा में चली। गठबंधन टूटना महज सीटों का झगड़ा भर नहीं है, बल्कि राजनीति में प्रैक्टिकल अप्रोच (झुकने या अड़ने) वाली अमित शाह की थ्योरी है। महाराष्ट्र में भाजपा सीएम उम्मीदवारी और सीटों को लेकर व्यावहारिक फार्मूले के साथ शिवसेना से बातचीत कर रही थी। प्रै्रक्टिकल अप्रोच थी, सीटें आधी-आधी और जिसकी ज्यादा सीट सीएम उसका। लेकिन उद्धव ठाकरे ने बातचीत में लगातार यही तर्क दिया कि भाजपा और शिवसेना के रिश्ते सियासी नहीं, पारिवारिक हैं। अंत में पार्टी ने आत्मीयता से ज्यादा सियासी नफा-नुकसान का रास्ता पकड़ा और गठबंधन तोड़ लिया।
लगभग डेढ़ साल से भाजपा ने धीरे-धीरे एकला चलो की तरफ कदम बढ़ाया। बिहार में लंबे समय के साथी जेडीयू के साथ गठबंधन तोड़ने का फैसला लिया। इसके बाद लोकसभा चुनाव में किसी भी बड़े क्षेत्रीय दल को एनडीए में शामिल करने की कोशिश नहीं की। जयललिता, ममता या बसपा की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि जब भाजपा खुद मजबूत है तो वह दूसरे दलों पर निर्भर क्यों रहे। भाजपा को सहयोगी दलों का जूनियर बनने की जगह खुद का आकार बड़ा करना चाहिए क्योंकि कैडर हमारे होते हैं। इसी फार्मूले के तहत शिवसेना से भी गठबंधन तोड़ने का फेसला लिया। भाजपा कमोबेश रूप से ऐसे छोटे-मोटे दलों को जोड़ने में दिलचस्पी ले रही है, जो किसी प्रदेश में देश में भाजपा के समकक्ष खड़ा नहीं हो सके। लिहाजा शिवसेना से गठबंधन तोड़ने का फैसला कर लिया। और छोटे-मोटे दलों को अपने साथ जोड़े रखा।