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योजना प्रक्रिया में बदलाव की पहल

7 वर्ष पहले
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केंद्र सरकारने योजना आयोग के स्थान पर नई संस्था के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नई दिल्ली में राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में आयोग को नया रूप देने पर सहमति बनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना प्रक्रिया को टीम इंडिया की भावना से जोड़ने की जरूरत बताई है। नई संस्था में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होंगे। सरकार ने योजना प्रक्रिया को व्यापक प्लेटफॉर्म पर ले जाने का इरादा जताया है। आयोग का वर्तमान ढांचा लगभग 60 वर्ष पुराना है। 1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर आयोग ने आकार लिया था। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री महालनोबिस ने पूर्व सोवियत संघ की तर्ज पर पंचवर्षीय योजनाओं की परिकल्पना पेश की थी। समय के साथ नीतियों, कार्यक्रमों के स्वरूप में परिवर्तन होता है, इसलिए नई व्यवस्था का स्वागत होना चाहिए। कांग्रेस की ओर से आयोग खत्म करने का विरोध स्वाभाविक है। कोई भी पार्टी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में बदलाव को सहजता से स्वीकार नहीं करती है। आर्थिक सुधारों के दौर में विकास के ढांचे को कारगर बनाने के लिए नए प्रयोग करना जरूरी है। योजनाओं के निर्धारण का वर्तमान तरीका पुराना पड़ चुका है। इसमें अधिक लोगों की भागीदारी नहीं है। योजनाएं बनाते समय राज्यों की विशिष्टताओं, समस्याओं और जरूरतों का पूरी तरह ध्यान नहीं रखा जाता है। योजनाएं ऊपर से थोपी जा रही हैं। योजनाओं के लिए बजट का निर्धारण राजनीतिक प्राथमिकताओं से परे रखने का रास्ता निकाला जाए। हालांकि ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा। आशा है, नई व्यवस्था इन बीमारियों का इलाज करेगी। संकेत हैं कि योजनाओं को आकार देने में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका हो सकती है। खुली अर्थव्यवस्था के दौर में ऐसा होना चाहिए। इसके साथ जनभागीदारी का रास्ता निकाला जाए। योजनाएं जिन लोगों के लिए बनती हैं, उसमें उनकी हिस्सेदारी न्यूनतम है। नए सिस्टम में इस पहलू पर गौर किया जाए। नई संस्था को अधिकारों और संसाधनों के केंद्रीकरण को रोकने का सिस्टम बनाना होगा। योजना आयोग की जगह कोई नया ढांचा खड़ा करने की प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए सरकार को फूंक फूंककर कदम रखने की जरूरत है। जल्दबाजी में बनाई गई कोई भी व्यवस्था वांछित परिणाम नहीं दे सकेगी।

संपादकीय