नई दिल्ली. भारत 21वीं सदी में नए प्रतिमान गढ़ने के लिए तत्पर है और सरकार की ओर से भी मेक इन इंडिया का नारा दिया गया है। इसे साकार करने के लिए जरूरत इस बात की है कि यूनिवर्सिटीज के अंदर एमसीआई, एआईसीटीई सहित अन्य रेगुलेटरी अथॉरिटीज की दखलंदाजी कम हो। जब एक बार यूनिवर्सिटी को एक्रिडिटेशन सर्टिफिकेट मिल गया, इसके अलावा नेक एक्रेडेटिड होने के बाद भी बार-बार इन संस्थाओं के हस्तक्षेप से एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के एजुकेशनल और रिसर्च वर्क प्रभावित होते हैं। यह कहना है जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलाधिपति (चांसलर) डा. हाबिल खोराकीवाला का।
उन्होंने कहा कि एजुकेशन और रिसर्च में नए इनोवेशन तभी संभव हैं, जब शिक्षण क्षेत्र को एजेंसियों से मुक्त रखा जाए। इस बारे में वह केंद्र सरकार को भी पत्र लिखेंगे। उन्होंने कहा कि जामिया हमदर्द में अभी 350 बिस्तर वाला अस्पताल चल रहा है। जिसकी क्षमता वह 700 करना चाहते हैं। दवा क्षेत्र में कैंसर सहित, अन्य जटिल बीमारियों की नई दवाएं इजाद करना चाहते हैं। क्योंकि कोई भी दवा भारत में 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है इसलिए हमें प्रशासनिक एजेंसियों के नियंत्रण की बजाए साइंटिफिक परामर्शदाता या मॉनिटरिंग एजेंसियों की जरूरत है। इसी से देश में शिक्षा और इनोवेशन प्रणाली में सुधार होगा, जो देश की जरूरत भी है।
इस दौरान जामिया हमदर्द के कुलपति प्रो. जीएन काजी ने बताया कि खोराकीवाला सोशल इंडस्ट्रीयल एक्टीविस्ट हैं, जिनकी हॉस्पिटल चैन और मेडिसन क्षेत्र में अच्छी पहचान है। जो खुद वॉकहार्ट ग्रुप के समूह चेयरमैन हैं। इनके चांसलर बनने से यूनिवर्सिटी की मेडिसन रिसर्च और छात्रों को हॉस्पिटल प्लेसमेंट में अच्छे पैकेज मिलने में मदद होगी। उन्होंने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी को मैनेजमेंट, मेडिसन, नर्सिंग, फार्मेसी, साइंस और इंजीनियरिंग के कोर्सेज चलाने के लिए करीब डेढ़ दर्जन एजेंसियों से हर पांच वर्ष में मान्यता लेनी होती है, उसके बाद भी एजेंसियों के अधिकारी यहां आते रहते हैं। जबकि यूनिवर्सिटी को नेक एक्रेडिटेशन में ए ग्रेड मिला हुआ है। ब्रिक्स देशों में जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय की रैंकिंग 23वें नंबर पर है।