नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के आतंकवादी, देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। 21 जनवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में फांसी की सजा पाए कैदियों की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का आदेश दिया था। भुल्लर को सितंबर 1993 में नई दिल्ली में बम विस्फोट के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी।
मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम और आर.एम लोढ़ा, एच.एल दात्तू और एस.जे. मुखोपाध्याय ने शुक्रवार को भुल्लर की पत्नी द्वारा दाखिल दया याचिका को स्वीकर कर लिया है। अब भुल्लर की दया याचिका पर खुले में सुनवाई हो सकती है। भुल्लर की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी जिसमें सुनवाई में देरी को आधार बनाया गया था।
गौरतलब है कि खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट का आतंकी भुल्लर नई दिल्ली में सितंबर 1993 में एक बम ब्लास्ट के सिलसिले में आरोपी है। इस बम ब्लास्ट में 9 लोगों की मौत हो घई थी औऱ तत्कालीन युवा कांग्रेस के प्रेसिडेंट, एम.एस.बिट्टा सहित 25 लोग घायल हो गए थे।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2002 को भुल्लर की दया याचिका को अस्वीकार कर दिया था जिसमें अगस्त 2001 में ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा दी थी और दिल्ली हाई कोर्ट ने 2002 में इस पर अपनी मुहर लगा दी थी। भुल्लर ने एक रीव्यू पेटिशन दाखिल किया था जिसे 17 दिसंबर, 2002 को खारिज किया गया था। तब भुल्लर ने एक क्यूरेटिव याचिका दाखिल की थी जिसे 12 मार्च 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से खारिज कर दिया था।
इस बीच भुल्लर ने प्रेसिडेंट के पास 14 जनवरी 2003 को दया याचिका दायर की। 8 वर्षों के अंतराल के बाद, प्रेसिडेंट ने 14 मई, 2011 को उसकी दया याचिका को खारिज कर दिया। इस देरी को आधार बनाते हुए भुल्लर ने फांसी की सजा को उम्र कैद में बदलने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
पिछले 21 जनवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में सरकार द्वारा अत्यधिक देरी को आधार मानते हुए 15 फांसी की सजा पाए कैदियों की सजा को कम करते हुए उनकी सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया जिसमें वीरप्पन के चार साथियों का नाम भी शामिल है।
अपने आदेश में तीन जजों के पीठ की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सदाशिवम ने कहा, “ दया याचिकाओं का निपटारा पहले कम से कम समय में कर दिया जाता था। 1980 तक दया याचिकाओं का निपटारा करने में 15 दिन से लेकर 10 से 11 महीने लगते थे। फिर 1980 से 1988 के बीच में दया याचिकाओं के निपटारा में समय ज्यादा लगने लगा और अब औसत तौर पर यह समय चार वर्ष तक बढ़ गया।”
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट को दया याचिकाओं के त्वरित गति से निष्पादन के लिए हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा।