नई दिल्ली: दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है। कहना गलत नहीं होगा कि यह
नरेंद्र मोदी के चेहरे की हार है। बीजेपी के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले पार्टी अध्यक्ष
अमित शाह की हार है। पार्टी के लिए लगातार 41 चुनाव जीतने वाले अमित शाह की रणनीति में ऐसी क्या चूक हुई कि बीजेपी को दिल्ली में इतनी बड़ी हार का सामना करना पड़ा? कुछ प्रमुख कारण ये रहे
आक्रामक कैम्पेन में विकास का एजेंडा भूले
लोकसभा चुनाव और राज्यों में हुए चुनावों की तरह ही भाजपा हाईकमान ने दिल्ली चुनाव में भी आक्रामक प्रचार अभियान चलाया। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और 100 से ज्यादा सांसदों की फौज को इसमें लगा दिया। सोशल मीडिया के अलावा प्रिंट मीडिया का भी जमकर इस्तेमाल किया गया। पार्टी अखबारों के बड़े-बड़े विज्ञापनों में
केजरीवाल का मखौल उड़ाने में जुटी रही, नकारात्मक प्रचार किया, लिहाजा लोगों को अपना विकास का एजेंडा समझाने में विफल रही। दिल्ली के मुद्दों को जोरदार ढंग से नहीं उठाया गया, जबकि राजधानी के पढ़े-लिखे और सभ्य लोगों के लिए स्थानीय मुद्दे अहम थे इसलिए उन्होंने नकारात्मक और आक्रामक कैम्पेन को नकार दिया।
चुनाव में देरी से मोदी मैजिक का लाभ नहीं
चुनाव में देरी के चलते भाजपा दिल्ली में मोदी लहर का लाभ उठाने में चूक कर गई, जबकि लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा व
जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में मोदी मैजिक एक आजमाया हुआ नुस्खा था और इसका तात्कालिक लाभ दिल्ली में भी मिल सकता था। कहा जा रहा है कि दिल्ली चुनाव में देरी पार्टी की खास रणनीति का हिस्सा थी ताकि संघ और भाजपा काडर को तैयारी का पूरा मौका मिल सके, लेकिन स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के अभाव के चलते काडर आपस में ही उलझ कर रह गए। मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान में देरी के चलते दिल्ली भाजपा गुटबाजी का शिकार हो गई।
मेनिफेस्टो की जगह विजन डाक्युमेंट फेल
भाजपा ने आप की स्ट्रैटजी को काउंटर करने के लिए आखिरी वक्त में अपनी रणनीति में एक और संशोधन किया और वह था- मेनिफेस्टो (घोषणा पत्र) की जगह विजन डाक्युमेंट पेश करना। इसमें दिल्ली के डेवलपमेंट के लिए रोडमैप पेश किया गया। इसमें विलंब होने के चलते पार्टी को जनता को इसे समझाने का वक्त ही नहीं मिला। सूत्रों के मुताबिक सीएम पद की उम्मीदवार
किरण बेदी द्वारा अपना एजेंडा पहले ही पेश कर देने के चलते भाजपा हाईकमान को अपनी रणनीति में संशोधन करना पड़ा।
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