नई दिल्ली. दिल्ली चुनाव में
ज्यादातर एग्जिट पोल के नतीजे आम आदमी पार्टी की सरकार बनने की ओर इशारा करते हैं।
इन चुनाव में सट्टा बाजार भी एग्जिट पोल के आंकड़ों की तस्दीक करता है। सट्टा बाजार ने भी अरविंद
केजरीवाल की अगुआई में दिल्ली में सरकार बनने का अनुमान लगाया है। लेकिन सट्टा बाजार में किस तरह दांव लगते हैं और बाजार आखिर कैसे तय करता है कि किसकी जीत होगी, यह जानने के लिए dainikbhaskar.com ने एक सटोरिए से बातचीत की। सटोरिए ने बताया कि कैसे तय होते हैं नेताओं के रेट और किस तरह ऑपरेट होता है सट्टा बाजार:
कैसे चलता है सट्टा बाजार?
सटोरिया-सट्टा बाजार खुले आम नहीं चलता ये। जान-पहचान वाले ही आपस में चलाते हैं। मान लीजिए कि मेरी जिम्मेदारी नई दिल्ली सीट की है। वहां का जिम्मा मेरा है, बड़ी मार्केट है। आप मेरी पहचान को हो और आप जैसे दस और हैं। उनके सौ और हैं। तो मेरी पहचान वाले जो दस हैं, अगर सौ या उन सौ के जानने वालों से वो सट्टा लगवाते हैं तो मुझे वे सौ नहीं जानते। सिर्फ दस जानते हैं, ये कड़ियां इसी तरह से बढ़ती हैं और कड़ियों की वजह से असल आदमी तक नहीं पहुंच सकते। इलाके की पुलिस से खतरा नहीं होता, लेकिन बड़े अफसरों से रहता हैं। वह (बड़ा अफसर) आ गया तो लोकल पुलिस वाला भी ढूंढता है।
कैसे तय होते हैं सट्टा बाजार में रेट?
सटोरिया-रेट सर्वे के आधार पर होता है, हम लोगों का सर्वे होता है। लोगों से पूछा जाता है, उसी आधार पर तय होता है। टेलीविजन के सर्वे का थोड़ा-बहुत असर तो होता ही है। जो सट्टा खेलते हैं, वही रेट तय करते हैं। बड़ी तादाद में लोग शामिल होते हैं। गिनती नहीं है कोई हजारों, लाखों से करोड़ तक की संख्या होती है। बाजार में लोगों की बातों से माहौल तय होता है और उसी पर रेट तय होता है। रेट एक-एक सीट पर तय होता है। जैसे मैंने बताया कि मेरी एक सीट की जिम्मेदारी है, तो सारी सीटों का रेट मुझे नहीं पता होगा। हां, ये जरूर है कि किसी को दूसरी सीट के कैंडिडेट पर पैसा लगाना है, तो मैं दूसरी सीट वालों को खबर भिजवाऊंगा। हर सीट पर कैंडिडेट के पक्ष में बने माहौल, सर्वे, लोकल लोगों से बातचीत के आधार पर रेट तय होता है। सिर्फ इतना ही नहीं है और भी चीजे हैं, जो बताना मुमकिन नहीं है।
आपके जो रेट खुलते हैं, वे कैसे खुलते हैं?
सटोरिया-पब्लिक के रुझान पर रेट खुलते हैं और हर सीट पर अलग-अलग लोग तय करते हैं। आप मान लीजिए
किरण बेदी की बात कर रहे हैं, सट्टा बाजार के हिसाब से वो जीत रही हैं, उनका हारना मुश्किल है। इसी तरह से हर सीट के माहौल पर रेट लगता है। जैसे एक रुपए पर तीस पैसे दे रहे हैं। यानी कि जिस पर पैसे ज्यादा दे रहे हैं, वह क्षेत्र में पीछे चल रहा है और जिस पर पैसे कम दे रहे हैं, वह आगे चल रहा है। यही तरीका है। मान लो कि किसी कैंडिडेट पर एक रुपए कोई लगाता है और हम उसे तीन रुपए देने की बात कर रहे हैं तो इसका मतलब कैंडिडेट हार रहा है और अगर कोई एक रुपये दे रहा है, बदले में तीस पैसे देने की बात कर रहे हैं तो वह जीत रहा है। सट्टा बाजार में ऐसा ही होता है।
कैसे लगता है सट्टा?
सटोरिया-मान लो किरण बेदी की सीट है, वह तो जीती हुई है। उस पर तो सभी लगाएंगे, तो ऐसे में बदले में दिए जाने वाला भाव घटा दिया जाता है। जैसे तीस रुपए पर तीन रुपए, यानी कोई तीस रुपए लगाएगा और उसे तीन रुपए मिलेंगे। कन्फर्म सीटों की जिम्मेदारी आमतौर पर कोई लेता नहीं है। सट्टा उन्हीं सीटों पर लगता है, जहां हार-जीत का आंकड़ा बदलने की गुंजाइश होती है। भाव उन्हीं कैंडिडेट पर ज्यादा होता है, जिनके हारने की उम्मीद सट्टा बाजार वालों की होती है।
आगे की स्लाइड में देखिए एग्जिट पोल के नतीजे: