नई दिल्ली. डीयू के आंबेडकर कॉलेज की लैब असिस्टेंट पवित्रा भारद्वाज के मामले में तीस हजारी कोर्ट ने कॉलेज के प्रिंसिपल डा. जीके अरोड़ा और यूडीसी रविंद्र सिंह को 29 सितंबर को तलब किया है। साथ ही पवित्रा भारद्वाज में पुलिसिया जांच और आरोपियों की दी गई क्लीनचिट पर भी सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने दो टूक कहा है कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि सारे सबूतों के होते हुए भी पुलिस ने जांच में निष्पक्षता नहीं दिखाई। ऐसे में पवित्रा भारद्वाज के पति धर्मेंद्र की प्रोटेस्ट याचिका को स्वीकार लिया है।
पवित्रा की ओर से कोर्ट में पेश हुए अधिवक्ता उदय गुप्ता ने कहा कि पवित्रा ने प्रिंसिपल और कॉलेज के यूडीसी पर यौन उत्पीड़न के अलावा मानसिक रूप से परेशान करने की शिकायत डीयू की अपैक्स कमेटी, दिल्ली पुलिस, महिला आयोग, तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और दिल्ली सरकार के उच्च शिक्षा निदेशालय में दी। वह बार-बार इन कार्यालयों में न्याय के लिए अपील के लिए चक्कर लगाती रही। दिल्ली सचिवालय के भी उसने कई चक्कर लगाए। हर तरफ से निराश होकर उसने सचिवालय के गेट पर आत्मदाह कर लिया और सुसाइड नोट भी छोड़ा, मरने से पहले एसडीएम को बयान में भी प्रिंसिपल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की।
बावजूद इसके पुलिस की ओर से प्रिंसिपल और यूडीसी को क्लीन चिट दे दी गई। गुप्ता बताते हैं कि मेट्रो पोलिटन मजिस्ट्रेट ने इसे गंभीरता से लिया और टिप्पणी की महिला अपराधों में पहले तो साक्ष्य नहीं मिलते, फिर कोई गवाह नहीं मिलता अगर मिल भी जाता है तो अपराध सिद्ध करने में दिक्कत आती हैं। बावजूद इसके पुलिस से दिवंगत पीड़िता के बयान और उसके पक्ष को सही से नहीं रखा।
पवित्रा के पति धर्मेंद्र ने कहा कि अभी तक न तो हमें न्याय मिला है और न ही आरोपी प्रिंसिपल को सजा। कॉलेज गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन ने बिना प्रबंध समिति की बैठक हुए ही कुलपति से प्रिंसिपल को पुन: बहाल करने की सिफारिश कर दी। और डीयू प्रशासन ने भी प्रिंसिपल अरोड़ा को बहाल कर दिया। जबकि हाईकोर्ट ने हमें कहा था कि गवर्निंग बॉडी में अपना पक्ष रखो। ऐसा वाकया केवल हमने फिल्मों में देखा था, अब तो कोर्ट से ही न्याय की उम्मीद है। क्योंकि डीयू प्रशासन के दबाव में पवित्रा को सालों तक चक्कर काटने के बाद भी डीयू अपैक्स कमेटी ने जांच रिपोर्ट तक नहीं दी थी।
अरोड़ा को तुरंत हटाया जाए:
डीयू में एएडी शिक्षक संगठन के प्रवक्ता डा. राजेश झा ने कहा कि सबसे पहले डीयू प्रशासन अपनी गलती में सुधार करते हुए आरोपी प्रिंसिपल को निलंबित किया जाए। क्योंकि प्रिंसिपल के खिलाफ आपराधिक मामला दायर है और यूनिवर्सिटी नियमों के मुताबिक ऐसे प्रिंसिपल को पद पर रहने का हक नहीं है।