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दिल्ली चुनाव: AAP की जीत को कुछ यूं डिकोड करते हैं राजनीतिक एक्सपर्ट

6 वर्ष पहले
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दिल्‍ली में आप की जीत को राजनीतिक जानकार भाजपा के लिए खतरे की घंटी बता रहे हैं। वे इस उसके लिए इस संदेश के रूप में देख रहे हैं कि वादे करने से ज्‍यादा जरूरी काम करके दिखाना है।
राजनीतिक विश्‍लेषक केजी सुरेश कहते हैं कि जनता ने आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत दिया है। सभी दलों को इन नतीजों से यही सीख लेनी चाहिए कि उनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं होना चाहिए। केजरीवाल ने भले ही पिछली बार सरकार बनने पर महज 49 दिन ही काम किया, लेकिन असल में काम करके दिखाया, यह जनता भी मानती है।
स्थानीय मुद्दों की जीत
आप ने बहुत सारे वायदे दिल्लीवासियों से किए हैं और अब जनता ने उन्हें मौका दिया है। अब उन्हें उन वायदों को अमली जामा पहनाना है। मेरा मानना है कि कोई भी चुनाव हो, मुद्दे हमेशा स्थानीय होने चाहिए। भाजपा ने दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने को कहा था, वहीं आप ने बिजली-पानी सस्ता करने का वादा किया। मैं ये नहीं कहता कि वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने की सोच गलत है, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि जहां लोगों की जरूरत नहीं पूरी हो रही, वहां उन्हें ऐसी सिटी बनने या न बनने से क्या लेना-देना होगा। आप ने स्थानीय मुद्दों पर अच्छा प्लान तैयार किया और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब रही।
एकजुट होंगी विपक्षी पार्टियां
आप की जीत से देश भर में बीजेपी की विपक्षी पार्टियों को ताकत मिली है। भाजपा की नीतियों के विपक्ष में खड़ी होने वाली पार्टियां पूरी तरह से हत्तोसाहित हो चली थीं। उन्हें आप की जीत से हिम्मत मिलेगी और वे पार्टियां भी पारदर्शी तरीके से लोगों से जुड़ने का प्रयास करेंगी।
बीजेपी जनता तक प्‍लानिंग नहीं पहुंचा पाई
राजनीतिक मामलों के जानकार के ए बद्रीनाथ का कहना है कि आम आदमी पार्टी की प्लानिंग और रणनीति बिल्कुल नई तरीके की थी। आप के वॉलंटियर्स जहां जनता के बीच पहुंचकर पार्टी का संदेश दे रहे थे। वहीं, बीजेपी अंदरूनी फूट से गुजर रही थी। एक वजह यह भी थी कि बीजेपी अपना मेसेज जनता के बीच पहुंचा ही नहीं पाई। आप नेताओं ने तो अपनी प्लानिंग सीधे साधे तरीके से जनता के सामने रख दी। इसके अलावा, पिछली गलतियों के लिए माफी मांगना भी उसके पक्ष में गया।

किरण बेदी का दांव हुआ मिसफायर
किरण बेदी को पार्टी का चेहरा बनाना और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भाजपा की हार की एक बड़ी वजह है। बीजेपी का कैंपेन करने वाले कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी नतीजों में दिखती है। बीजेपी के लिए सबसे सेफ सीट कृष्णानगर में किरण बेदी का हारना कार्यकर्ताओं के लेवल पर फैले असंतोष को जाहिर करता है।
एके पर सीधा हमला की रणनीति हुई बेकार
दोनों पार्टियों के बीच जो आरोप-प्रत्यारोप के दौर चले, उनमें भाजपा की तुलना में आप की टिप्पणियां और दलीलें ज्यादा सटीक रहीं। सबसे बड़ी गलती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बयानबाजी करके की। मंच से उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों को दिल्ली की जनता पर थोपने का प्रयास किया। लोकसभा और राज्य चुनाव में अंतर होता है, राष्ट्रीय मुद्दे राज्य पर लागू नहीं होते। आप को मिला भारी बहुमत वास्तविकता में देखा जाए तो वॉलैंटियर्स की मेहनत है। नपी-तुली बयानबाजी और हमलों को काटना है।
यूपी और बिहार के लिए बीजेपी को होना होगा अलर्ट
आप ने राज्य और मोहल्ला स्तर पर प्लान बनाया। भाजपा की झोली खाली थी, वह अपना चेहरा बाहर से ढूंढकर लायी और खुद के लिए सबसे बड़ी मुसीबत खड़ी कर ली। मुझे लगता है कि भाजपा को आने वाले बिहार और यूपी के चुनाव के लिए अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। केजरीवाल के पक्ष में बहुमत आने पर जदयू नेता नीतीश कुमार ने ही सबसे पहले अरविंद को फोन किया, बधाई दी। अन्य ने भी किए होंगे, दरअसल यह भाजपा के खिलाफ माहौल बनने की शुरुआत है। जो उम्मीदें लोगों ने भाजपा और मोदी से लगाई हैं, उनको समय रहते यदि पूरा न करके सिर्फ बयानबाजी की गई, तो भाजपा को इसका खामियाजा बिहार और यूपी के चुनाव में भुगतान पड़ सकता है। भाजपा के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वह राज्य स्तर पर राष्ट्रीय मुद्दों को थोपने के बजाए सूबे की परेशानियों, जरूरतों और जनता की सुविधाओं के मद्देनजर प्लान तैयार करे।
कांग्रेस को पहले से पता था अपना हाल
आप के प्रति उमड़े इस समर्थन का अंदाजा कांग्रेस को पहले से ही था, शायद तभी वो शुरुआत से ही बैकफुट पर नजर आई। अजय माकन को चेहरा बनाकर आगे किया, ताकि जो भी किरकिरी हो उसके लिए शीर्ष नेतृत्व को जिम्मेदार न ठहराया जा सके। यही वजह थी कि राहुल गांधी ने अपने कैंपेन में मोदी को टारगेट किया, लेकिन आप पर सवाल नहीं उठाए।
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