नई दिल्ली. अपनी तबाही में अपना ही हाथ है।
दिल्ली चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए यह कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि पार्टी जनता को सकारात्मक राजनीति की ओर आकर्षित करने के बजाय आम आदमी पार्टी के खिलाफ नाकारात्मक कैंपेन में जुटी रही। आम लोगों की जरूरतों को पूरा करने की सोच जाहिर करने का मैसेज नहीं दे पायी। इसके अलावा, पैराशूट उम्मीदवार
किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर प्रदेश यूनिट के लोगों को सीधे तौर पर नकार देना भी भारी पड़ा।
सिर्फ बात करने से नहीं चलेगा काम
राजनीतिक विशेषज्ञ संजय मिश्रा के मुताबिक, यह हार भाजपा के लिए सबक है कि विकास और सुशासन की सिर्फ बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसा होते दिखना भी चाहिए। केंद्र में सरकार आने के बाद कई राज्यों के चुनावों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया, जहां स्पष्ट बहुमत भी मिला। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये थी कि वहां कोई आम आदमी पार्टी जैसा विपक्षी दल नहीं था। कांग्रेस या वो दल थे, जिनसे लोगों को कोई उम्मीद नहीं थी। दिल्ली की पढ़ी-लिखी जनता ने 'आप' को स्पष्ट बहुमत देकर देश को तीसरे विकल्प का रास्ता दिया है।
किरण बेदी को लाने का दांव उलटा पड़ा
रहा सवाल किरण बेदी का, तो उनके आने के बाद अंदरूनी असंतोष बढ़ा। इसके चलते पार्टी अपने वास्तविक इरादे को जनता के बीच पहुंचाने में नाकामयाब हो गई। मेरी मानें तो बेदी पर दांव लगाना बीजेपी के लिए संभवतः उलटा साबित हो गया। यदि भाजपा पहले उन्हें पार्टी में लेकर आती, तो शायद विरोध के इतने स्वर ही नहीं उठते। इसके अलावा, पार्टी किसी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी न घोषित करती, तो भी दिल्ली के सारे भाजपा नेता जी-जान लगाकर कोशिश करते। लेकिन जैसे ही बेदी का नाम आया, सबने किनारा काट लिया, क्योंकि सबके सपने टूट गए।
जाति-धर्म की राजनीति को अब जनता नहीं देती तरजीह
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि दिल्ली चुनाव में यह स्पष्ट हो गया है कि जाति-धर्म के मुद्दे को अब जनता तरजीह नहीं देती, बल्कि मूल सुविधाएं ही उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली और पानी की सुविधाएं मुहैया करने के वादे लेकर चुनावी मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी ने इन्हीं आधारों पर जीत दर्ज की है। मध्यम वर्ग आज रोजगार चाहता है, वह उलझना नहीं चाहता बेवजह की बातों पर, वास्तविकता में विकास कि परिभाषा शैक्षणिक विकास है।
आम आदमी के जरूरतों की 'आप' ने की राजनीति
राजनीतिक विशेषज्ञ अजीत सिंह के मुताबिक आम आदमी की जरूरतों के मुद्दों को लेकर 'आप' ने वैसी ही राजनीति दिल्ली चुनाव में अपनायी, जैसी लोकसभा चुनाव में
नरेंद्र मोदी ने अपनायी थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि
केजरीवाल की तुलना में बेदी भी कम विश्वासनीय नहीं हैं। उनकी छवि ईमानदार और मजबूत भी है, पर वह केजरीवाल की तरह राजनीति के दांव-पेंच समझ सकने वाली नेता नहीं हैं। भाजपा का मास्टर स्ट्रोक देरी से लगने की वजह से धड़ाम हो गईं, भितरघात बढ़ गया। यही वजह रही कि चौका-छक्का मारने की बजाय भाजपा दिल्ली चुनाव में क्लीन बोल्ड हो गई। रही-सही कसर बेदी की छोटी-मोटी गलतियों ने पूरी कर दी। मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार घोषित होने से पहले कार्यकताओं और फिर बाद में दिल्ली के सासंदों को घर बुलाकर जिस अंदाज में उन्होंने मीटिंग ली, इससे गलत संदेश गया। बाद में डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश तो हुई, पर तब तक देर हो चुकी थी।
केजरीवाल पर जुबानी हमलों से हुआ बीजेपी को नुकसान
प्रधानमंत्री ने जिस तरह की जुबान का इस्तेमाल किया, उससे भाजपा को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ। निजी तौर पर हुए हमले को केजरीवाल ने जिस
खूबसूरती से मोड़ दिया, उससे भाजपा को नुकसान ही हुआ और केजरीवाल को सहानुभूति मिली। एक और वजह है, जिस पर भाजपा के थिंकटैंक ने गौर नहीं किया कि लोकसभा चुनाव के ठीक बाद यदि दिल्ली में चुनाव कराए जाते तो नतीजे कुछ और होते। लेकिन उसने तो 'आप' को संभलने का मौका दे दिया और खुद की मिट्टी पलीद करने के लिए उन्हें समय दिया। इतना ही नहीं, 'आप' के हमले का जवाब तक ढंग से पार्टी नहीं दे पाई। उपद्रवी गोत्र को लेकर जिस तरह से केजरीवाल ने पूरे अग्रवाल समाज को उपद्रवी गोत्र से जोड़ा, उसका कोई जवाब पार्टी नेताओं को नहीं सूझा, जिसका बड़ा गलत मैसेज जनता के बीच गया कि भाजपा जातिवाद और धर्मवाद की राजनीति करती है।
देर से उम्मीदवारों की घोषणा और बाहरियों को टिकट देने से हारी बीजेपी
राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ.विनय प्रकाश के मुताबकि, 'आप' और कांग्रेस की तुलना में भाजपा ने बहुत बाद में जाकर अपने उम्मीदवार घोषित किए। इससे उन्हें जनता के बीच जाकर अपनी बात कहने के लिए मात्र दो हफ्ते का ही वक्त मिला। पार्टी के अंदर भितरघात इस कदर हावी था कि कई जगह पर ऐसा लगा कि संगठन चुनाव ही नहीं लड़ रहा है। खबर यह भी है कि सारे फैसले मिलकर नहीं, केवल चंद नेताओं ने लिए हैं। अपने मजबूत उम्मीदवारों छोड़कर बाहर से आए नेताओं को टिकट देना भी भाजपा पर भारी पड़ा है। दूसरी बात, उम्मीदवारों के चयन में काफी लापरवाही बरती गई। प्रदेश पार्टी अध्यक्ष तक को टिकट नहीं मिला। सालों पार्टी में रहे कार्यकताओं की अनदेखी की गई, जिससे उनके अंदर निराशा फैली और वे घर से बाहर ही नहीं निकले और जब तक उन्हें निकालने की कोशिश हुई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भाजपा ने घोषणापत्र तक जारी नहीं किया और उसकी जगह पर विजन डॉक्युमेंट जारी किया गया, इसमें साफ-साफ कुछ भी नहीं था। यानी बिजली और पानी के रेट कितने कम करेंगे, जो महज रस्म अदायगी नजर आई। बिना वजह दिल्ली के चुनाव में इतने मंत्री और नेताओं को उतारा गया।
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