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कम फीस में अच्छी शिक्षा देने वाले बजट स्कूलों पर तालाबंदी की तलवार क्यों?

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. गली-कूचों के अंदर कम फीस में गुणवत्ता परक शिक्षा देने वाले स्कूलों पर तालाबंदी की तलवार लटकी है। न तो इन स्कूलों को सरकार से जमीन मिलती है और न ही यह मोटी फीस वसूलते हैं। लेकिन सरकार चाहती है कि स्कूल शिक्षकों को छठे वेतन आयोग के तहत तय मानक पर वेतन का भुगतान करें। स्कूल की इतनी आमदनी है ही नहीं। शिक्षा के अधिकार (आरटीई)-2009 के तहत सरकार की ओर से इन स्कूलों के गले में फंदा कस दिया गया है। इसी का नतीजा है कि 17 राज्यों के 19,414 स्कूलों में पढ़ने वाले 34,94,520 छात्रों का भविष्य अधर में है, क्योंकि इन स्कूलों को राज्य सरकार के अधिकारियों की ओर से आरटीई के तहत नोटिस जारी किए गए हैं, जिनमें बड़ा सवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों को छठे वेतन आयोग के तहत वेतन देना है। यह बातें शनिवार को दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलांयस (नीसा) और सेंटर फोर सिविल सोसायटी द्वारा बजट प्राइवेट स्कूल के समक्ष चुनौतियां और अवसर विषय पर आयोजित विषय में उठीं।
कार्यक्रम में राज्यसभा से सांसद विजय गोयल ने कहा कि ये स्कूल प्राथमिक तौर पर कम फीस वाले वो स्कूल हैं, जो कि समाज के गरीब तबके के लिए कार्य करते हैं। मोदी सरकार निजी स्कूलों के महत्व को समझती है, इसलिए किसी भी सूरत में इन स्कूलों में बंद नहीं होने दिया जाएगा। नीसा की ओर से सुधार की दिशा में आने वाले सुझावों पर चर्चा के बाद सुधार की दिशा में प्रयास किए जाएंगे। नीसा के अध्यक्ष आरसी जैन ने कहा कि क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी घर के नजदीक वाले बजट प्राइवेट स्कूलों में पढ़े। उनके खुद के बेटे उनके स्कूल में पढ़े और आज वह सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट हैं। नीसा के उपाध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने बताया कि अंबाला में उनके स्कूल से पढ़कर एक छात्र अब राज्य सरकार में वित्त आयुक्त हैं। जैन ने कहा कि देश भर के बजट स्कूलों की फीस 500 रुपये या उससे कम है। जबकि आरटीई में सरकार स्कूलों में छात्रों को फ्री एजुकेशन देने के लिए एक छात्र के एवज में 1190 रुपये का भुगतान प्रतिमाह की दर से करती है। हमारी तो सरकार को यही सलाह है कि वह सरकारी स्कूलों के शिक्षा स्तर में सुधार करे। इससे बजट स्कूलों की स्थिति तो सुधरेगी ही साथ ही सरकारी स्कूलों पर लोगों का विश्वास बनेगा।

उन्होंने बताया कि नीसा की पहल पर ही राजस्थान में सरकार ने कक्षा, 3, 5 और 8 में पढ़ने वाले छात्रों के अच्छे प्रदर्शन न होने पर उन्हें अगली कक्षा में प्रमोट न करने का निर्णय लिया है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। ऐसे ही हम चाहते हैं कि बजट स्कूलों की आमदनी के हिसाब से ही उनके खर्च बजट स्कूल खुद निर्धारित करें, इसकी स्वायत्तता सरकार दे। साथ ही स्कूलों की मान्यता इन्फ्रास्ट्रक्चर और वेतन की बजाए परिणाम को देखकर जारी रहे। इस चर्चा में विचारक गुरचरन दास ने कहा कि बजट स्कूलों को आरटीई और अन्य कानूनों के बंधन से मुक्त करना जरूरी है। क्योंकि यह वह स्कूल हैं, जो बच्चों में गुणात्मक शिक्षा का विकास करते हैं।