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चार वर्षीय स्नातक कोर्स का मुद्दा जनहित याचिका के जरिए अदालत पहुंचा

8 वर्ष पहले
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नई दिल्ली.दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रस्तावित चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के वर्तमान स्वरूप को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस कर जवाब मांगा है। डीयू को नोटिस जारी करते हुए मुख्य न्यायाधीश डी. मुरु गसेन और न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने 15 मई तक हलफनामा दायर करने को कहा है। डीयू के वकील ने न्यायालय से कहा कि अकादमिक परिषद (एसी) ने प्रस्तावित पाठ्यक्रम से संबंधित कई अन्य मुद्दों का समाधान कर दिया है।
उन्होंने कहा कि जनहित याचिका में उठाई गई शिकायतों पर भी विचार किया गया है। डीयू आगामी सत्र से चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू करेगा। विकलांगों के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था संभावना द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया कि अगर वर्तमान स्वरूप में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लागू किया गया तो दृष्टि बाधित छात्रों को काफी नुकसान होगा क्योंकि उन्हें गणित जैसे विषयों को पढ़ना होगा जिनसे उन्हें छूट दी गई है। याचिका में कहा गया है कि जब पाठ्यक्रम की अनुशंसा की गई तो दृष्टिबाधित छात्रों की संमस्याओं पर गौर नहीं किया गया।
इसमें कहा गया है अगर यह पाठ्यक्रम वर्तमान स्वरूप में लागू हो गया तो ऐसे छात्र पहले वर्ष के फाउंडेशन पाठ्यक्रम की जरूरतों क ो पूरी नहीं कर पाएंगे। इसमें 11 आवश्यक पाठ्यक्रम हैं जिसमें गणितीय क्षमता और विज्ञान एवं मानविकी शामिल है। याचिक ा में दृष्टिबाधित छात्रों के लिए ब्रिज कोसर्स शुरू करने के लिए डीयू को निर्देश देने की मांग की गई है ताकि छात्र फाउंडेशन कोर्स करने में सक्षम हो सकें।
डीयू में सभी कोर्स सिलेबस पास
डीयू में चार वर्षीय स्नातक कोर्स के सभी सिलेबस पास कर दिए गए। उसके बाद शाम को आठ फाउंडेशन और चार लें?वेज कोर्स पर शुरू हुई चर्चा देर रात तक जारी थी। जिन्हें बनाने वाले प्राध्यापक और विभिन्न विभागों के एक्सपर्ट एसी सदस्यों के सामने इन कोर्सो की उपयोगिता पर विस्तार से व्याख्यान दे रहे थे। जबकि छात्रों को मिलने वाली डिग्री के लिए ऑर्डिनेंस में क्या प्रस्ताव हैं? वह चर्चा के लिए सामने लाए जाने वाले थे। अधिकांश एसी सदस्यों का यही कहना था कि ऑर्डिनेंस पर वह लोग विरोध जताने आए थे। लेकिन उसी को मध्यरात्रि में चर्चा करने के लिए लाया जाएगा। यह भी डीयू प्रशासन की सोची-समझी चाल है।
पास किए गए 43 कोर्स पर छह लोगों ने डायसेंट दिए। अब सभी पास सिलेबस और कोर्स स्ट्रेक्चर को बृहस्पतिवार दोपहर से शुरू होने वाली ईसी (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) में फाइनल मंजूरी की मोहर के लिए रखा जाएगा। विरोध जताने वाले प्राध्यापकों का अस्पष्ट कहना था कि वह चार साल स्नातक के पक्ष में ही नहीं है तो फिर कोर्स स्ट्रक्चर और सिलेबस पर चर्चा कैसी। क्योंकि डीयू ने कोर्स सिलेबस भी आनन-फानन में शॉर्ट नोटिस पर तैयार कराया है।
एसी सदस्यों के तर्क
'कोर्स स्ट्रक्चर ही गलत बना है। पास और ऑनर्स के कोर्स को बिना यूनिवर्सिटी ऑर्डिनेंस में संशोधन किए कैसे मर्ज किया जा सकता है? ऐसे में चार साल से पहले एग्जिट होने वाला छात्र आधा अधूरा सिलेबस ही पढ़ सकेगा। ऐसे कोर्स का क्या फायदा? ’
डा. रेनू बाला, डीयू एसी सदस्य, डीटीएफ
'स्कूल में बच्चे दसवीं कक्षा के बाद जिन विषयों में कमजोर रह जाते हैं, उन्हें छोड़कर बारहवीं में दूसरे विषय चुनते हैं। फिर डीयू में दोबारा से छोड़े गए विषयों को पढ़ाने का क्या औचित्य? जबकि छात्रों की उसे विषय में रूचि नहीं है। किसी छात्र को गणित से डर लगता है तो किसी को फिजिक्स, कैमिस्ट्री से। इसलिए अनिवार्य फाउंडेशन कोर्स का कोई औचित्य नहीं बनता।’
अमिताभ चक्रवर्ती, डीयू एसी सदस्य, डीटीएफ
'अभी रात के 9 बज चुके हैं, लेकिन ऑर्डिनेंस पर चर्चा नहीं हो सकी है। जबकि वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अभी तो राजनीति विज्ञान में एक पेपर संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर पर पढ़ाए जाने और कॉमर्स के कोर्स में कोई संशोधन सुझाव होगा तो उसे अगले वर्ष संशोधित करने पर मंजूरी देने सहित सभी कोर्स पास कर दिए गए हैं।’
डा. अजय भागी, डीयू एसी सदस्य, एनडीटीएफ
'मेरा पक्ष तो शारीरिक रूप से विकलांग खासकर के नेत्रहीन छात्रों को लेकर है। जो साइंस के प्रैक्टिकल और गणित के प्रश्नों को कैसे हल करेंगे? ’
डा. निखिल जैन, डीयू एसी सदस्य, संभावना