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नर्सरी दाखिला: स्कूल तय करेंगे गाइडलाइन, याचिका खारिज

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट ने नर्सरी दाखिले पर स्कूलों की स्वायत्तता संबंधी सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए शिक्षा निदेशालय द्वारा लगाई गई स्टे याचिका को बुधवार को खारिज कर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने कहा कि अब मामले में फाइनल सुनवाई जनवरी में सर्दियों की छुट्टी के बाद होगी। लेकिन जनहित में हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और उपराज्यपाल को भी लिखेंगे कि सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा जाए।
अगर स्कूलों को फ्री हैंड छूट मिली तो दाखिला प्रक्रिया में स्कूलों की मनमानी चलेगी और दाखिला सीटों पर खुलेआम खरीद-फरोख्त होगी। हालांकि कोर्ट ने सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराया है। इसमें सरकारी स्कूलों की स्थित को ठीक करने के लिए कहा गया है।
नर्सरी पर कोर्ट का फैसला संजीदा और बैलेंस-एनपीएससी : नेशनल प्रोग्रेसिव स्कूल कांफ्रेंस (एनपीएससी) के मुताबिक हाईकोर्ट की ओर से बुधवार काे दिया गया फैसला संजीदा और बैलेंस है। यह पेरेंट्स, बच्चों और स्कूलों के हित में है। सबसे महत्वपूर्ण हैं दिल्ली के बच्चे। सरकार को ध्यान देना होगा कि उन्हें अब तीन साल के बच्चों को भी नर्सरी में दाखिला देकर पढ़ाना है। इसके लिए केंद्रीय विद्यालयों और सरकारी स्कूलों में भी नर्सरी विंग शुरू करनी होगी। क्योंकि दिल्ली की आबादी का अगर 2 फीसदी बच्चा भी नर्सरी में दाखिले के लिए आता है तो बहुत सारे स्कूल चाहिए।
अब निजी स्कूल यह खुद तय कर सकेंगे कि उनके स्कूल में दाखिला प्रक्रिया कैसे बेहतर हो सकती है। एकल प्वाइंट फार्मूला हर किसी स्कूल पर फिट नहीं बैठता। इस बात को कोर्ट ने भी समझा।
क्या करे सरकार
सोशल ज्यूरिस्ट के फाउंडर अध्यक्ष अधिवक्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि कोर्ट ने शिक्षा निदेशालय और सरकार से स्पष्ट कहा है कि उनके पास कोई पावर नहीं है, जिसके तहत वह निजी स्कूलों पर पाबंदी लगा सकें। अग्रवाल ने उपराज्यपाल को सलाह दी है कि वह शिक्षा के अधिकार कानून को दिल्ली एजुकेशन एक्ट 1973 में एक ऑर्डिनेंस जारी कर जोड़ दें तो निदेशालय के पास पूरी शक्ति होगी।